Lingaraj temple की मान्यता क्या है और इस मंदिर में कब देते हो भगवन शिव दर्शन !!

Lingaraj Temple Bhubaneswar

Lingaraj Temple लिंगराज मंदिर भारत के ओडिशा शहर राजधानी भुवनेश्वर में स्थित यह सब से बड़ा मंदिर हैं। यह भुवनेश्वर महाराज का प्रिय मन्दिर माना जाता है| यह शहर का सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और इस शहर में प्राचीनतम (Histrology) के हिसाब से यह महान मंदिरों में से एक है। यह मंदिर वैसे तो भगवान शिव को समर्पित है| परन्तु शालिग्राम के रूप में भगवान विष्णु भी यहां मौजूद हैं। मंदिर के निकट बिंदुसागर सरोवर है| इस मंदिर की स्थापना 617-657 ई. / 0वीं या 11वीं शताब्दी में बनाया गया है| वैसे तो इस मंदिर की बहुत मान्यता है| आपको बता दे की लिट्टी एवं वसा नामक दो राक्षसों का वध देवी पार्वती ने यहीं पर किया था, लड़ाई के बाद जब तो शिवजी ने कूप बनाकर सभी पवित्र नदियों को योगदान के लिए बुलाया यहीं पर बिन्दूसागर सरोवर है| क्या आप जानते है कि शिवजी के कितने पुत्र थे ?

Lingaraj Temple

Lingaraj Temple History In Hindi

Lingaraj Temple History उसके निकट ही लिंगराज का विशालकाय मन्दिर है। जब से ही इस मंदिर को भगवन शिव के नाम से पूजा जाता है और उस दिन से इस मंदिर की बहुत मान्यता है| यहाँ लोग आते है भगवन शिव का आशीर्वाद लेते है| यहां पूजा का भी नियम है, वैसे तो हर जगह पूजा के नियम होते है लेकिन इस मंदिर के नियम कुछ इस प्रकार है – यहां की पूजा पद्धति के अनुसार सर्वप्रथम बिन्दुसरोवर में स्नान किया जाता है. फिर क्षेत्रपति अनंत वासुदेव के दर्शन किए जाते हैं| उसके बाद गणेश पूजा होती है और फिर शिवजी के वाहन नंदी की पूजा के बाद लिंगराज के दर्शन के लिए मुख्य स्थान में प्रवेश किया जाता है। जहां आठ फ़ीट मोटा तथा क़रीब एक फ़ीट ऊंचा ग्रेनाइट पत्थर का स्वयंभू लिंग स्थित है।
Lingaraj Temple

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Lingaraj Temple Architecture

इस मंदिर में जब भगवन शिव ने देवी पार्वती की इच्छा पूरी की थी| उस ही प्रकार भगवन  शिव भक्तों की इच्छा भी पूरी करते है। इस मंदिर की बहुत मान्यता है| पुराणी कथा के अनुसार Pandit बताते है कि मध्ययुग में यहाँ सात हज़ार से अधिक मन्दिर और पूजास्थल थे. जिनमें से अब क़रीब पाँच सौ ही शेष बचे हैं। माना जाता है कि 11वीं सदी में सोमवंशी राजा ययाति केसरी ने मंदिर का निर्माण करवाया। Lingaraj Temple Height 180 फुट के शिखर वाले मंदिर का प्रांगण 150 मीटर वर्गाकार का है और कलश की ऊंचाई 40 मीटर है। मंदिर के शिखर की ऊंचाई 180 फुट है। गणेश, कार्तिकेय तथा गौरी के तीन छोटे मन्दिर भी मुख्य मन्दिर के विमान से संलग्न हैं। गौरीमन्दिर में पार्वती की काले पत्थर की बनी प्रतिमा है। शिव पुराण में बताए गए है ”मृत्यु” के ये 12 संकेत !

Lingaraj Temple

Who Built Lingaraj Temple

वैसे तो भगवन शिव को समर्पित है किन्तु शालिग्राम के रूप में भगवान् विष्णु भी यहाँ मौजूद है। यह Lingaraj Temple मंदिर का वर्तमान सवरूप 11वी शताब्दी के अंतिम दशकों में बनवाया गया था। लिंगराज मंदिर का निर्माण 6वी शताब्दी में किया गया था जिसका उल्लेख सांस्कृतिक ग्रंथो में किया गया है।इस मंदिर का निर्माण कार्य ललाटइंदू केसरी ने प्रांरम्भ करवाया था जिन्होंने 615 से 657 ईस्वी तक शासन किया था। मौजूदा मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजा जजाती केसरी ने 11 वी शताब्दी में करवाया था। उन्होंने तभी अपनी राजधानी को जाजपुर से भुबनेश्वर सधानान्तरित किया था।इस स्थान को भरम पुराण में एकमात्र क्षेत्र बताया गया है किन्तु इसके कुछ हिस्से 1400 वर्ष तक से भी ज्यादा पुराने है।

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Lingaraj Temple

Lingaraj Temple Bhubaneswar Architecture लिंगराज मंदिर पर शिल्पकारी

मन्दिर में हर दिवार हर कोने में कारीगरी और मूर्तिकला का चमत्कार है। इस मन्दिर को भारत के लोगो द्वारा अवस्था का शिखर माना जाता है। यह नीचे से  तो सीधा तथा समकोण है किन्तु ऊपर पहुँचकर धीरे-धीरे वक्र होता चला गया है और शीर्ष पर प्रायः वर्तुल दिखाई देता है। इसका शीर्ष चालुक्य मन्दिरों के शिखरों पर बने छोटे गुम्बदों की तरह नही दिखाई देता| यहाँ तक कि मन्दिर के प्रत्येक पाषाण पर कोई न कोई अलंकरण उत्कीर्ण है। जगह-जगह मानवाकृतियों तथा पशु-पक्षियों से सम्बद्ध सुन्दर मूर्तिकारी भी प्रदर्शित है। सर्वांग रूप से देखने पर मन्दिर चारों ओर से स्थूल व लम्बी पुष्पमालाएँ या फूलों के मोटे गजरे पहने हुए जान पड़ता है। क्या आप जानते है की भगवान शिव , विष्णु और ब्रह्मा के पिता कौन हैं?
Lingaraj Temple

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Lingaraj Temple Bhubaneswar Mahashivratri

मान्यता – धार्मिक कथा है कि ‘लिट्टी’ तथा ‘वसा’ नाम के दो भयंकर राक्षसों का वध देवी पार्वती ने यहीं पर किया था। संग्राम के बाद उन्हें प्यास लगी, तो शिवजी ने कूप बनाकर सभी पवित्र नदियों को योगदान के लिए बुलाया। यहीं पर बिन्दुसागर सरोवर है| तथा उसके निकट ही लिंगराज का विशालकाय मन्दिर है। सैकड़ों वर्षों से भुवनेश्वर यहीं पूर्वोत्तर भारत में शैवसम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र रहा है। मान्यताओ के अनुसार मध्ययुग में यहाँ सात हजार से अधिक मन्दिर और पूजास्थल थे, जिनमें से अब लगभग पाँच सौ ही शेष बचे हैं।  शिवलिंग का रूप शिवलिग जैसा ही है गोलाकार| जिसमें से एक ओर से पानी जाने का मार्ग है लेकिन वही  बीचों-बीच लिंग न होकर चाँदी का शालीग्राम है जो विष्णु जी है। गहरे भूरे लगभग काली शिवलिंग की काया के बीच में सफेद शालिग्राम जैसे शिव के हृदय में विष्णु समाए है।
Lingaraj Temple

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Lingaraj Temple Images

गर्भग्रह के अलावा जगमोहन तथा भोगमण्डप में सुन्दर सिंहमूर्तियों के साथ देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएँ हैं। यहाँ की पूजा पद्धति के अनुसार सर्वप्रथम बिन्दुसरोवर में स्नान किया जाता है, फिर क्षेत्रपति अनंत वासुदेव के दर्शन किए जाते हैं, जिनका निर्माणकाल नवीं से दसवीं सदी का रहा है। गणेश पूजा के बाद गोपालनीदेवी, फिर शिवजी के वाहन नंदी की पूजा के बाद Lingaraj Temple लिंगराज के दर्शन के लिए मुख्य स्थान में प्रवेश किया जाता है। जहाँ आठ फ़ीट मोटा तथा क़रीब एक फ़ीट ऊँचा है। हरि है विष्णु जिन्हें शिव ने हरा है, इसी से इन्हें हरिहर कहा जाता है। यहाँ की विशेषता यही है कि शिव-विष्णु एक साथ होने से ऑक के फूल और तुलसी एक साथ चढ़ाए जाते है। ओङीसा में जगन्नाथ पुरी जाने से पहले पौराणिक मान्यता के अनुसार लिंगराज मंदिर में हरिहर के दर्शन किए जाने चाहिए।
Lingaraj Temple
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