जानिए क्यों है शनि की चाल धीमी !

shani ki vakra gati :

शनि को सबसे धीमी गति से चलने वाला ग्रह मन जाता हे उनके धीमी गति के कारण ही उनका नाम शनैश्चर पड़ा है – उनके इस नाम में दो अर्थ जुड़े है ,शनैः: तथा चर.शनैः का अर्थ होता है – धीरे और तथा चर का अर्थ होता है – चलने वाला , इसलिए शनि सबसे लम्बे समय तक प्रभवित करने वाला ग्रह मन जाता है|

आखिर शनि की चाल धीमी क्यों है :

इसके पीछे की पौराणिक कहानी ये है की ऋषि दधीचि ने जगत कल्याण के लिए अपने आप का बलिदान दिया और अपनी हड्डियों को इंद्रा देव को सौंप दिया जिससे की इंद्रा देव ने वज्र का निर्माण किया | उनकी पत्नी उस समय गर्भ से थी जब उनको ये बात पता चली तो उन्होंने अपने गर्भ काट हर पीपल के पेड़ के नीचे रख दिया और खुद भी प्राण त्याग दिए|

shani ki vakra gati :

नवजात शिशु की परवरिश दधीचि की बहन दधिमती ने की और उसका नाम पिप्पलाद रखा | उनका पिप्पलाद नाम रखने के पीछे कारण यह था की उनका जन्म पीपल के पेड़ के नीचे हुआ | पीपल के पेड़ के नीचे ही उन्होंने तप किया और पीपल के पत्ते ही उनका भोजन थे| जब पिप्पलाद बड़े हुए तो उन्हें पता लगा की उनके पिता ऋषि दधीचि की मृत्यु उनके जन्म से पहले हुई थी |

उन्होंने जब अपने की मृत्यु के संबंध में देवताओ से पूछा तो देवताओ ने बताया की शनिदेव की दृष्टि पड़ने के कारण तुम्हरे पिता की मृत्यु हुई | यह जानकर पिप्लाद ने अपने तपस्वी शक्ति से शनिदेव पर ब्रह्मदण्ड का प्रहार किया | शनिदेव ब्रह्मदण्ड के प्रहार से बचने के लिया भागने लगे लेकिन ब्रह्मदण्ड का एक प्रहार शनिदेव के पैर पर लगा जिस से उनके पेरो में पहले जैसी शक्ति नही रही |शनिदेव भागते हुए शिवजी के पास गए और पिप्लाद से अपनी रक्षा के लिए विनती करी | तब शिवजी जी ने पिप्लाद को रोका और समझाया कि इसमें शनि देव का कोई दोष नहीं है | वे तो सृष्टी के नियमों का पालन कर रहे है, आपके पिता का काल आ चूका था | यह सुनकर पिप्लाद को अपनी गलती समझ में आई और उन्होंने ब्रह्मदण्ड वापस ले लिया परन्तु उस ब्रह्मदण्ड का असर शनिदेव के पेरो में आज भी है|

ऐसा मन जाता है की पिप्लाद के अंश थे अतः जो पिप्लाद ऋषि का समरण करता है उन्हें शनि कभी कष्ट नही देते |