ज्वालामुखी देवी – जहाँ पूजा होती है धरती से निकली ज्वाला की और जहाँ अकबर ने भी मानी हार !

Jwalamukhi Devi Temple

chamunda devi, chamunda devi temple, chintpurni, chintpurni temple, jawala ji, jwala dev, jwala ji, jwalaji temple, jwalamukhi, jwalamukhi temple, mata chintpurni
Panditbooking वेबसाइट पर आने के लिए हम आपका आभार प्रकट करते है. हमारा उद्देस्य जन जन तक तकनीकी के माध्यम से हिन्दू धर्म का प्रचार व् प्रसार करना है तथा नयी पीढ़ी को अपनी संस्कृति और धार्मिक ग्रंथो के माध्यम से अवगत करना है . Panditbooking से जुड़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक से हमारी मोबाइल ऐप डाउनलोड करे जो दैनिक जीवन के लिए बहुत उपयोगी है. इसमें आप बिना इंटरनेट के आरती, चालीसा, मंत्र, पंचांग और वेद- पुराण की कथाएं पढ़ सकते है.

इस लिंक से Android App डाउनलोड करे - Download Now

Jwalamukhi Temple

ज्वालामुखी देवी(Jwalamukhi) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कांगड़ा से करीब दो घण्टे की दूरी पर है. सभी ५१ शक्तिपीठों में यह शक्तिपीठ अनोखा इसलिए माना जाता है कि यहाँ ना तो किसी मूर्ति की पूजा होती है ना ही किसी पिंडी की, बल्कि यहाँ पूजा होती है धरती के अन्दर से निकलती ज्वाला की.

धरती के गर्भ से यहाँ नौ स्थानों पर आग की ज्वाला निकलती रहती है, इन्ही पर मंदिर(Jwalamukhi Temple) बना दिया गया है और इन्ही पर प्रसाद चढ़ता है | माँ के इस चमत्कार को देखने के लिए संसार भर से यहाँ श्रधालुओ की भीड़ लगी रहती है. मान्यता है कि सभी शक्तिपीठों में देवी हमेशा निवास करती हैं और शक्तिपीठ में माता की आराधना करने से माता जल्दी प्रसन्न होती है | नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला बीच में स्थित है, उसे महाकाली कहते हैं. अन्य आठ ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में निवास करती हैं.

ये भी पढ़े... अगर आप धन की कमी से परेशान है या फिर आर्थिक संकट से झूझ रहे है या धन आपके हाथ में नहीं रुकता तो एक बार श्री महालक्ष्मी यन्त्र जरूर आजमाएं !

Jwalamukhi Temple Story:

इतिहास से माँ ज्वाला के मंदिर(Jwalamukhi) और मुगल बादशाह अकबर के संबंध में एक बड़ी दिलचस्प कथा मिलती है. एक बार अकबर ने जब माँ के इस अनोखे ज्वाला के बारे में सुना तो उसने इस ज्वाला को किसी भी तरह बंद करने का आदेश दिया, लेकिन अनगिनत कोशिश करने पर भी वो ऐसा ना कर सका. अंत में इसकी चमत्कारी शक्ति को जानकार उसने यहाँ पर मत्था टेका और सवा मन (पचास किलो) सोने का छत्र चढ़ाया.

मंदिर के पास ही गोरख डिब्बी है, कहते हैं कि यहाँ गुरु गोरखनाथ जी पधारे थे और अपने चमत्कार दिखाए थे | इस जगह पर एक कुण्ड है इसमें भरा हुआ जल लगातार उबलता रहता है और फिर भी ठंडा है. इस मंदिर(Jwalamukhi) का प्राथमिक निमार्ण राजा भूमि चंद के करवाया था, बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया.

आखिर नवरात्रियों के पावन अवसर पर केवल माता को ही क्यों पूजा जाता है ?