ज्वालामुखी देवी – जहाँ पूजा होती है धरती से निकली ज्वाला की और जहाँ अकबर ने भी मानी हार !

Jwalamukhi Temple

ज्वालामुखी देवी(Jwalamukhi) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कांगड़ा से करीब दो घण्टे की दूरी पर है. सभी ५१ शक्तिपीठों में यह शक्तिपीठ अनोखा इसलिए माना जाता है कि यहाँ ना तो किसी मूर्ति की पूजा होती है ना ही किसी पिंडी की, बल्कि यहाँ पूजा होती है धरती के अन्दर से निकलती ज्वाला की.

धरती के गर्भ से यहाँ नौ स्थानों पर आग की ज्वाला निकलती रहती है, इन्ही पर मंदिर(Jwalamukhi Temple) बना दिया गया है और इन्ही पर प्रसाद चढ़ता है | माँ के इस चमत्कार को देखने के लिए संसार भर से यहाँ श्रधालुओ की भीड़ लगी रहती है. मान्यता है कि सभी शक्तिपीठों में देवी हमेशा निवास करती हैं और शक्तिपीठ में माता की आराधना करने से माता जल्दी प्रसन्न होती है | नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला बीच में स्थित है, उसे महाकाली कहते हैं. अन्य आठ ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में निवास करती हैं.

Jwalamukhi Temple Story:

इतिहास से माँ ज्वाला के मंदिर(Jwalamukhi) और मुगल बादशाह अकबर के संबंध में एक बड़ी दिलचस्प कथा मिलती है. एक बार अकबर ने जब माँ के इस अनोखे ज्वाला के बारे में सुना तो उसने इस ज्वाला को किसी भी तरह बंद करने का आदेश दिया, लेकिन अनगिनत कोशिश करने पर भी वो ऐसा ना कर सका. अंत में इसकी चमत्कारी शक्ति को जानकार उसने यहाँ पर मत्था टेका और सवा मन (पचास किलो) सोने का छत्र चढ़ाया.

मंदिर के पास ही गोरख डिब्बी है, कहते हैं कि यहाँ गुरु गोरखनाथ जी पधारे थे और अपने चमत्कार दिखाए थे | इस जगह पर एक कुण्ड है इसमें भरा हुआ जल लगातार उबलता रहता है और फिर भी ठंडा है. इस मंदिर(Jwalamukhi) का प्राथमिक निमार्ण राजा भूमि चंद के करवाया था, बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया.