आखिर क्या महत्व है शंख का ?

importance of shankh :

सनातन धर्म के प्रतीक शंख को हर धर्म शास्त्र में जगह मिली है और इसका अपना महत्व है | इसके वादन से सभी भुत-प्रेत , संकट ,दुराचार ,पाप , कष्ट और गरीबी का नाश होता है | प्राचीन काल से ही शंख ने अपना महत्व सिद्ध किया है और अगर हम महाभारत की बात करे तो भगवान कृष्ण ने इस युद्ध में अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया था |

यदि हम आज के युग की बात करे तो शंख का महत्व वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जा सकता है क्योकि शंख को बजाने से हमारे फेफड़ो का व्यायाम होता है और श्वास सम्बन्धी सारे रोग से लड़ने की शक्ति मिलती है | पूजा के समय पर आप शंख में जल भर कर रखे और फिर उसको पूजा स्थल पर छिड़क दे, इसमें वातावरण से सारे कीटाणुओं का नाश करने की अदभुत शक्ति होती है |

शंख मुख्यतः दो प्रकार के होते है, वामावर्त शंख और दक्षिणावर्त शंख | वामावर्त संख को केवल पूजा के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है| कहा जाता है की इसमें भगवान विष्णु का निवाश होता है, शंख विष्णु का स्वरूप माना जाता है | दक्षिणवर्त शंख को मुख्यतः केवल वादन के लिए प्रयोग में लिया जाता है, इस शंख को देवी देवताओ के अभिषेक तथा किसी कन्या के कन्यादान के समय प्रयोग में लाया जाता है |

शंख की स्थापना से माँ लक्ष्मी का घर में वाश होता है , स्वय माँ लक्ष्मी कहती है की शंख उनका सहोदर भ्राता है | भारतीय संस्कृति में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है ,कहा जाता है की समुद्र मंथन से शंख 14 रत्नो के रूप में प्राप्त हुआ था तथा इसकी ध्वनि धर्म का मार्ग प्रशस्त करती है | भागवत पुराण के अनुसार इसके संबंध में एक कथा है की ऋषि संदीपन के आश्रम में श्री कृष्ण की शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात कृष्ण ने उनसे दक्षिणा लेने की आग्रह की | तब ऋषि ने कहा की नदी में डूबे मेरे पुत्र को जाके ले आओ, कृष्ण ने नदी में जाकर शंखासुर नमक दानव को मारा तथा ऋषि के पुत्र को उसकी कैद से छुड़ाया | कहा जाता है की शंखासुर नामक असुर जब मरा तो उसका खोल (शंख) अलग गिर गया, जो बाद में श्रीकृष्ण के पाञ्चजन्य शंख के नाम से प्रसीद हुआ.