सूर्य की किरणों से सुनहरा हो जाता है पर्वत और बन जाता है ॐ पर्वत पर…

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यकीन करना मुश्किल है मगर आस्था का केंद्र कैलाश मानसरोवर आपने साथ कई अनोखी और रहस्यमयी बातों को छुपाए हुए है।
मानसरोवर का नाम सुनते ही हर किसी का मन वहां जाने को बेताब हो जाता है। मानसरोवर के पास एक सुन्दर सरोवर राकसताल है। दो सरोवरों के उत्तर में कैलाश पर्वत है। इसके दक्षिण में गुरला पर्वतमाला और गुरला शिखर है। मानसरोवर के कारण कुमाऊं की धरती पुराणों में उत्तराखंड के नाम से जानी जाती है।
यहां का नाम सुनते ही मन में श्रद्धा और भक्ति की भावना जागृत हो जाती है। यहां जाना कठिन होता है लेकिन भगवान शिव के दर्शन करने हर साल हजारों श्रद्धालु इन कठिन रास्तों की परवाह किए बिना कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाते हैं।
यहां की सबसे खास बात तो ये है की सूर्य की पहली किरणें जब कैलाश पर्वत पर पड़ती हैं तो यह पूर्ण रूप से सुनहरा हो जाता है। इतना ही नहीं, कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान आपको पर्वत पर बर्फ़ से बने साक्षात ‘ॐ’ के दर्शन हो जाते हैं। कैलाश मानसरोवर की यात्रा में हर कदम बढ़ाने पर दिव्यता का एहसास होता है। ऐसा लगता है मानो एक अलग ही दुनिया में आ गए हों।
इसे ॐ पर्वत  इसलिए कहा जाता है क्योंकि पर्वत का आकार व इस पर जो बर्फ़ जमी हुई है वह ओउम आकार की छटा बिखेरती है तथा ओउम का प्रतिबिंब दिखाई देता है। पर्वत पर ॐ अक्षर प्राकृतिक रूप से उभरा है। ज्यादा हिमपात होने पर प्राकृतिक रूप से उभरा यह ॐ अक्षर चमकता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। ॐ पर्वत कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर भारत-तिब्बत सीमा – लिपुलेख पास से 9 कि.मी पहले नवींढांग (नाभीढांग) नामक स्थान पर है। अप्रैल 2004 से छोटा कैलास की यात्रा शुरू हुई। तभी से इस पर्वत का महत्व भी बढ़ गया
कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है। सदियों से देवता, दानव, योगी, मुनि और सिद्ध महात्मा यहां तपस्या करते आए हैं। मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति मानसरोवर (झील) की धरती को छू लेता है, वह ब्रह्मा के बनाये स्वर्ग में पहुंच जाता है और जो व्यक्ति झील का पानी पी लेता है, उसे भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है।
ये भी कहा जाता है कि ब्रह्मा ने अपने मन-मस्तिष्क से मानसरोवर बनाया है। दरअसल मानसरोवर संस्कृत के मानस (मस्तिष्क) और सरोवर (झील) शब्द से बना है। मान्यता है कि ब्रह्ममुहुर्त (प्रात:काल 3-5 बजे) में देवतागण यहां स्नान करते हैं। ग्रंथों के अनुसार, सती का हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह झील तैयार हुई।
इसे 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना गया है। गर्मी के दिनों में जब मानसरोवर की बर्फ़ पिघलती है, तो एक प्रकार की आवाज़ भी सुनाई देती है। श्रद्धालु मानते हैं कि यह मृदंग की आवाज़ है। एक किंवदंती यह भी है कि नीलकमल केवल मानसरोवर में ही खिलता और दिखता है।
कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए तीर्थयात्रियों को भारत की सीमा लांघकर चीन में प्रवेश करना पड़ता है क्योंकि यात्रा का यह भाग चीन में है। कैलाश पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 20 हजार फीट है। यह यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती है। कहते हैं जिसको भोले बाबा का बुलावा आता है वही इस यात्रा को कर सकता है। सामान्य तौर पर यह यात्रा 28 दिन में पूरी होती है। कैलाश पर्वत कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।
कैलाश पर्वत की परिक्रमा वहां की सबसे निचली चोटी दारचेन से शुरू होकर सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है। यहां से कैलाश पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है मानों भगवान शिव स्वयं बर्फ से बने शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इस चोटी को हिमरत्न भी कहा जाता है।

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