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जाने माँ काली से जुड़े आश्चर्यचकित करने वाले 7 अनोखे तथ्य, जिन्हे सुन प्राप्त होती माता की विशेष कृपा !

maa kali

देवो के देव महाकाल की काली (maa kali), काली से अभिप्राय समय अथवा काल से है। काल वह होता है जो सब कुछ अपने में निगल जाता है।  काली भयानक एवं विकराल रूप वाले श्मशान की देवी। वेदो में बताया गया है की समय ही आत्मा होती है। आत्मा को ही समय कहा जाता है।

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माता काली की उत्तपति धर्म की रक्षा हेतु हुई व पापियों के सर्वनाश के करने के लिए हुई है।काली माता 10 महाविद्याओ में से एक है। उन्हें देवी दुर्गा की महामाया (maa kali) कहा गया है।

कलियुग में तीन देवता है जागृत :- कलियुग में तीन देवता को जागृत बताया गया है। हनुमान, माँ काली एवं काल भैरव . माता काली का अस्त्र तलवार तथा त्रिशूल है व माता का वार शक्रवार है। माता काली का दिन अमावश्या कहलाता है। माता काली के चार रूप है 1 . दक्षिण काली 2 . श्मशान काली 3 . मातृ काली 4 . महाकाली. माता काली की उपासना जीवन में सुख, शान्ति, शक्ति तथा विद्या देने वाली बताई गई है।

माता काली(maa kali) के दरबार की विशेषता :- हमारे हिन्दू सनातन धर्म में बताया है की कलयुग में सबसे ज्यादा जगृत देवी माँ काली होगी। माँ कालिका की पूजा बंगाल एवं असम में बहुत ही भव्यता एवं धूमधाम के साथ मनाई जाती है। माता काली के दरबार में जब कोई उनका भक्त एक बार चला जाता है तो हमेशा के लिए वहां उसका नाम एवं पता दर्ज हो जाता है।माता के दारबार में यदि दान मिलता है तो दण्ड भी प्राप्त होता है।

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यदि माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है तो माता को रुष्ट करने श्राप भी भुगतना पड़ता है। यदि आप माता काली के दरबार में जो भी वादा पूर्ण करने आये है उसे अवश्य पूर्ण करें। यदि आप अपने मनोकामना पूर्ति के बदले माता को कोई वचन पूर्ण करने के लिए कहते है तो उसे अवश्य पूर्ण करें अन्यथा माता रुष्ट हो जाती है।

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जो एकनिष्ठ, सत्यावादी तथा अपने वचन का पका होगा माता उसकी मनोकामना भी अवश्य पूर्ण करती है।

माँ दुर्गा ने लिए थे कई जन्म :- माँ दुर्गा ने कई अवतारों एवं जन्म लिए है। माता के जन्म के संबंध में दो कथाएं अधिक प्रसिद्ध है। पहली कथा के अनुसार माता ने राजा दक्ष के घर में सती के रूप में जन्म लिया था। इसके बाद यज्ञ के अग्नि कुंड में कूदकर अपने प्राणो की आहुति दे दी थी।दूसरी कथा के अनुसार माता ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया था इस जन्म में माता का नाम पार्वती था. दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र थे।

उनकी दत्तक पुत्री थीं सती, जिन्होंने तपस्या करके शिव को अपना पति बनाया।  शिव की जीवनशैली दक्ष को बिलकुल ही नापसंद थी। शिव और सती का अत्यंत सुखी दांपत्य जीवन था। शिव को बेइज्जत करने का खयाल दक्ष के दिल से नहीं गया था।इसी मंशा से उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें शिव और सती को छोड़कर सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया।

जब सती को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने उस यज्ञ में जाने की ठान ली।शिव से अनुमति मांगी। तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि जब हमें बुलाया ही नहीं है, तो हम क्यों जाएं? सती ने कहा कि मेरे पिता हैं तो मैं तो बिन बुलाए भी जा सकती हूं। लेकिन शिव ने उन्हें वहां जाने से मना किया तो माता सती को क्रोध आ गया। क्रोधित होकर वे कहने लगीं- ‘मैं दक्ष यज्ञ में जाऊंगी और उसमें अपना हिस्सा लूंगी, नहीं तो उसका विध्वंस कर दूंगी।

वे पिता और पति के इस व्यवहार से इतनी आहत हुईं कि क्रोध से उनकी आंखें लाल हो गईं। वे उग्र-दृष्टि से शिव को देखने लगीं। उनके होंठ फड़फड़ाने लगे। फिर उन्होंने भयानक अट्टहास किया। शिव भयभीत हो गए। वे इधर-उधर भागने लगे। उधर क्रोध से सती का शरीर जलकर काला पड़ गया।

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उनके इस विकराल रूप को देखकर शिव तो भाग चले। जिस दिशा में भी वे जाते वहां एक-न-एक भयानक देवी उनका रास्ता रोक देतीं। वे दसों दिशाओं में भागे और 10 देवियों ने उनका रास्ता रोका। अंत में सभी काली में मिल गईं। हारकर शिव सती के सामने आ खड़े हुए. उन्होंने सती से पूछा- ‘कौन हैं ये?’

सती ने बताया- ‘ये मेरे 10 रूप हैं। आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं। आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं, पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी। पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में द्यूमावती। दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी। उत्तर-पूर्व में षोडशी हैं। मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं।’ माता का यह विकराल रूप देख शिव कुछ भी नहीं कह पाए और वे दक्ष यज्ञ में चली गईं।

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दुखो को तुरंत दूर करती है महाकाली :- 10 महाविद्याओ में माँ काली की साधन को साधक अधिक महत्वता देते है क्योकि माँ काली ही एक ऐसी देवी है जो अति शीघ्र अपने भक्तो से प्रसन्न हो जाती है। यदि साधना सही प्रकार से सम्पन्न की जाए माता के आशीर्वाद से साधक अष्टसिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। माँ काली की साधना के लिए किसी के निर्देशों अथवा किसी उच्च कोटि के साधक की आवश्यकता अनिवार्य अन्यथा चूक होने पर साधना के विपरीत परिणाम भी प्राप्त हो सकते है।

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माता की साधना में माँ काली के यंत्र एवं उनके मंत्रो के साथ उपासना करनी होती है। माता को प्रसन्न करने के लिए चढ़ावा चढ़ाया जा सकता है।यदि माता की काली पूरी श्रद्धा भाव से पूजा करी जाए तो माता की विशेष कृपा होती है और साधक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है।

जीवन रक्षक माँ काली :- माता काली की साधना अथवा पूजा करने वाले भक्त को माँ काली सभी तरह से निर्भीक एवं सुखी बना देती है। माँ काली के भक्त पर किसी तरह का संकट नहीं आता। माँ काली अपने भक्तो सभी तरह के परेशानी से बचाती है।

* लम्बे समय से चली आ रही बिमारी माता के आशीर्वाद से सही हो जाती है.

* माता काली के भक्तो पर जादू टोना एवं टोटके आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

* माता काली की पूजा में इतनी ताकत होती है की इसके प्रभाव से सही न होने वाली बिमारी भी दूर हो जाती है।

*हर प्रकार की बुरी ताकतों से माता रक्षा करती है ।

* कर्ज से छुटकारा दिलाती है।

* बेरोजगारी, करियर, या शिक्षा में असफलता को दूर करती है।

माँ काली का अचूक मन्त्र :- माता काली के अचूक मन्त्र का प्रयोग करने से माता अपने भक्त की पुकार अति शीघ्र सुन लेती है. परन्तु इस मन्त्र के प्रयोग में अत्यधिक सावधानी बरतने की जरूरत है।इस मन्त्र को किसी पर आजमाने के लिए प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। यह मन्त्र तब ही प्रयोग में लाये जब आप माँ काली के भक्त हो।

||ॐ नमो काली कंकाली महाकाली मुख सुन्दर जिह्वा वाली||
चार वीर भैरों चौरासी, चार बत्ती पूजूं पान ए मिठाई।
अब बोलो काली की दुहाई।

kali mata

इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जप से भक्त की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है तथा कर्ज आदि से छुटकारा प्राप्त होता है।

कालरात्रि :- माता कालरात्रि देवी दुर्गा के 9 रूपों में सातवां रूप है जिसमे माता विद्युत की माल धारण करती है. माता गदर्भ की सवारी करती है उनके गले में नर मुंड की माला होती है व हाथ खड्ग एवं खपर।

शुभंकरी :- कालरात्रि माता को शुभंकरी भी कहा जाता है. भयंकर रूप होते हुए भी माता अपने भक्तो के लिए कल्याणकारी है. माता के हाथ में कटा हुआ सर होता है जिससे रक्त निकलता रहता है।

माता काली(maa kali) के विषय में कहा जाता है की यह दुष्टों के बाल पकड़कर उनका सर काट देती है. रक्तबीज से युद्ध करने के दौरान भी माता ने उसके बाल पकड़कर उसके सर को काट दिया था तथा उस सर से निकल रहे रक्त को एक पात्र में भर उसका सेवन किया।

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