दानवीर कर्ण एवं द्रोपदी दोनों करना चाहते थे एक दूसरे से विवाह परन्तु इसलिए नहीं चुना द्रोपदी ने कर्ण को अपना पति … !

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Karna :-

जब कर्ण ( karna ) का जन्म हुआ था उस समय कुंती अविवाहित थी. समाज के तानो एवं लांछनों से बचने के लिए कुंती ने अपने पुत्र कर्ण ( karna ) को नदी में बहा दिया. एक सूत परिवार को कर्ण जब बहते हुए मिला तो उन्होंने कर्ण ( karna ) को अपने पुत्र के रूप में पालने का निर्णय लिया. सूत दम्पति के पास पलने के कारण कर्ण ( karna ) सूतपुत्र कहलाए.

कर्ण ( karna ) ने अपनी शिक्षा दीक्षा परशुराम के आश्रम में सम्पन्न करी. कर्ण अंगदेश के राजा थे. एक बार कर्ण जब पांचाल नगरी अपने मित्र दुर्योधन के किसी कार्य से आये तो वहां उन्हें एक सुंदर कन्या दिखी जिसका नाम द्रोपदी था. द्रोपदी एवं कर्ण ( karna ) दोनों एक दूसरे को देखकर आकर्षित हो गए तथा दोनों एक दूसरे से विवाह करना चाहते थे.

स्वयम्बर से पूर्व द्रोपदी ने यह निर्णय लिया था की वह स्वयम्बर में कर्ण ( karna ) के गले में ही वह वरमाला डालेगी. परन्तु आखिर ऐसा किया हुआ की द्रोपदी ने स्वयंबर में अपना निर्णय बदल लिया और कर्ण की जगह अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी ?

दरअसल स्वयंबर से पूर्व द्रोपदी इस बात से अपरिचित थी की कर्ण ( karna ) एक सूत पूत्र है तथा यह बात द्रोपदी को अपनी एक दासी से पता चली. अब यदि द्रोपदी कर्ण ( karna ) से विवाह करती तो उसके परिवार को अनेको लांछनों का समाना करना पड़ता अतः अपने परिवार के सम्मान को बचाने के लिए द्रोपदी को न चाहते हुए भी कर्ण के साथ विवाह के प्रस्ताव को ठुकराना पड़ा.

द्रोपदी के स्वयम्बर में महाराज द्रुपद ने यह शर्त रखी थी की जो भी वीर पुरुष सामने रखे धनुष को उठाकर, उसमे डोर चढ़ाकर उपर घूम रही मछली के आँखों में निशाना लगाएगा वही मेरी पुत्री से विवाह करने योग्य होगा.

परन्तु यह प्रतिस्प्रथा इतनी आसान नहीं थी जितनी लग रही थी. वास्तविकता में जो धनुष स्वयम्बर के लिए रखा गया था वह एक विशेष धातु से बना हुआ था जिस कारण उसका वजन बहुत अधिक हो गया था,

जिसे उठाने के लिए हाथी जितने बल की आवश्यकता पड़ती. तथा मछली की आँखों में निशाना निचे तेल से भरे बर्तन में मछली की परछाई देख कर लगाना था. इसके आलावा निशाने के लिए केवाल एक ही बाण का प्रयोग किया जा सकता था.

इस प्रकार के शर्त को पूरा करने का सामर्थ्य अर्जुन के अलावा केवल कर्ण ( karna ) के पास था. क्योकि धनुर्विद्या में वे अर्जुन के समान कुशाल थे, केवल कुशल ही नहीं कई बार उन्हें अर्जुन से ज्यादा सामर्थ्यावान माना गया है.

कर्ण ( karna ) स्वयम्बर में रखी गई शर्त को पूरा करने के लिए उठे तथा उन्होंने उस अत्यधिक वजनी धनुस को एक ही बार में उठा लिया. उनके इस पराक्रम को देख सभा में सभी आश्चर्यचकित रह गए. उधर द्रोपदी जानती थी की कर्ण ( karna ) स्वयंबर में रखे गए शर्त को अवश्य ही पूरा कर लेंगे. और वह ऐसा चाहती थी परन्तु अपने परिवार के सम्मान को ध्यान में रख द्रोपदी ने कर्ण को अपमानित कर उन्हें स्वयंबर की शर्त पूरी करने से रोक दिया.

जैसे ही कर्ण ( karna ) मछली की आँख में निशाना लगाने वाले थे. उसी समय द्रोपदी उठी और उसने उच्ची आवाज में चिल्लाते हुए कहा ” में एक सूत पुत्र से विवाह नहीं कर सकती “, द्रोपदी की इस बात को सुन सभा में उपस्थित सभी व्यक्ति हसने लगे. कर्ण द्रोपदी द्वारा किये गए अपने इस अपमान को सहन नहीं कर पाये तथा उसी समय स्वयम्बर को छोड़ वहां से चले गए.

द्रोपदी द्वार हुए अपमान के कारण कर्ण ने विवाह का विचार ही छोड़ दिया था परन्तु अपने पिता के जिद के कारण उनके दो विवाह हुए. उनकी पहली पत्नी का रुषाली थी तथा दूसरी पत्नी सुप्रिया थी. अपनी दोनों पत्नियों से कर्ण को नौ पुत्रों की प्राप्ति हुई. सुप्रिया का वर्णन महाभारत में बहुत ही कम हुआ है.

वृशसेन, वृशकेतु, चित्रसेन, सत्यसेन, सुशेन, शत्रुंजय, द्विपात, प्रसेन और बनसेन ये कर्ण के नौ पुत्र थे. कर्ण ( karna ) के सभी पुत्र महाभारत के युद्ध में शामिल हुए, जिनमें से 8 वीरगति को प्राप्त हो गए. प्रसेन की मौत सात्यकि के हाथों हुई, शत्रुंजय, वृशसेन और द्विपात की अर्जुन, बनसेन की भीम, चित्रसेन, सत्यसेन और सुशेन की नकुल के द्वारा मृत्यु हुई थी.

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