मृत्यु के देव यमराज का चौकाने वाला रहस्य, जान आप हो जाओगे हैरान !

कहते की मनुष्य धरती पर जो कुछ भी करता है वह सब कुछ चित्रगुप्त उसके खाते में लिखते जाते है. तथा उस व्यक्ति के मृत्यु के पश्चात यमदूतों द्वारा यमराज के सामने उसकी आत्मा को प्रस्तुत किया जाता.

यमराज के हाथो में यह निर्णय होता है की उस आत्मा के साथ क्या करना है. यमराज द्वारा इसका निर्धारण उसके कर्मो के आधार पर किया जाता है.

वैसे हमारे हिन्दू सनातन धर्म में दिन देवताओ को दण्ड देने का अधिकारी माना जाता है- यमराज, शनिदेव तथा भैरव . यमराज मनुष्य के अच्छे व बुरे कर्म के आधार पर स्वर्गलोक, नरकलोक तथा पितृलोक भेज देते है व कुछ का पुनः जन्म होता है.

आइये जानते है मृत्यु के देवता यमराज से कुछ रोचक तथ्य :-

14 प्रकार के यमराज :- स्मृतियों के अनुसार 14 यम माने गए हैं- यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त. ‘धर्मशास्त्र संग्रह’ के अनुसार 14 यमों को उनके नाम से 3-3 अंजलि जल तर्पण में देते हैं.

यमराज का नाम :- यम का अर्थ होता है संयम और नियंत्रण, मृत्यु के देवता यमराज को धर्मराज भी कहा जाता है. यम के लिए पितृपति, कृतांत, शमन, काल, दंडधर, श्राद्धदेव, धर्म, जीवितेश, महिषध्वज, महिषवाहन, शीर्णपाद, हरि और कर्मकर विशेषणों का प्रयोग होता है.एक धर्मशास्त्र का नाम भी यम है.

यमराज का परिवार :- विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा के गर्भ से उतपन्न सूर्य पुत्र को यम रखा गया. यमलोक के राजा यम की पत्नी का नाम यमी है. उनका शस्त्र दण्ड है तथा वाहन भेषा था. यमराज का सहयोगी चित्रगुप्त कहलाता है.

यमराज के पिता सूर्य देव है, उनकी बहन का नाम यमुना है तथा उनके भाई का नाम श्रादेव मनु है.

मृत्यु के देवता और दक्षिण के दिक्पाल :- ‘मार्कण्डेय पुराण’ के अनुसार दक्षिण दिशा के दिक्पाल और मृत्यु के देवता को यम कहा जाता है. दस दिशाओं के दिकपाल ये हैं- इंद्र, अग्नि, यम, नऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईश्व, अनंत और ब्रह्मा.

यमराज का रूप :- पुराणों में यमराज के रूप के संबंध में विचित्र वर्णन किया गया है. यमराज का रंग हरा बताया गया है तथा उनके वस्त्र लाल रंग के है. उनके हाथो में सदैव एक गदा रहते तथा वे भैंसे की सवारी करते है.

यमराज के मुंशी :- यमराज के मुंशी ‘चित्रगुप्त’ हैं जिनके माध्यम से वे सभी प्राणियों के कर्मों और पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखते हैं. चित्रगुप्त की बही ‘अग्रसन्धानी’ में प्रत्येक जीव के पाप-पुण्य का हिसाब है.

यमलोक का वर्णन :- 17 दिन तक बगैर रुके आत्मा यमलोक की यात्रा करती है तथा 18 वे दिन वह यमपुरी पहुंचती है. यमपुरी तथा यमलोक का वर्णन गरुड़पुराण तथा कठोपनिषद पुराण में मिलता है.

मृत्यु के 12 दिनों के बाद मानव की आत्मा यमलोक का सफर प्रारंभ कर देती है. पुराणों अनुसार यमलोक को ‘मृत्युलोक’ के ऊपर दक्षिण में 86,000 योजन दूरी पर माना गया है. एक योजन में करीब 4 किमी होते है.

गरुड़ पुराण में यमलोक के मार्ग में वैतरणी नदी का वर्णन मिलता है, वैतरणी नदी विष्ठा तथा रक्त से भारी होती है.

जिस व्यक्ति ने अपने जीवित जीवन में गाय को दान दिया होता है वह वैतरणी नदी को आसानी से पार कर लेता है अन्यथा वे वैतरणी नदी में डूबते रहते है तथा यमदूत उन्हें नदी में धक्का देते है.

यमपुरी पहुंचने के बाद आत्मा ‘पुष्पोदका’ नामक एक और नदी के पास पहुंच जाती है जिसका जल स्वच्छ होता है और जिसमें कमल के फूल खिले रहते हैं. इसी नदी के किनारे छायादार बड़ का एक वृक्ष है, जहां आत्मा थोड़ी देर विश्राम करती है.

यहीं पर उसे उसके पुत्रों या परिजनों द्वारा किए गए पिंडदान और तर्पण का भोजन मिलता है जिससे उसमें पुन: शक्ति का संचार हो जाता है.

पुराणों के अनुसार यमलोक एक लाख योजन क्षेत्र में फैला और इसके चार मुख्य द्वार हैं. यमलोक में आने के बाद आत्मा को चार प्रमुख द्वारों में से किसी एक में कर्मों के अनुसार प्रवेश मिलता है.

दक्षिण का द्वार :- यमलोक के चार मुख्य द्वारा में से दक्षिण के द्वार से पापियों का प्रवेश होता है. यह मार्ग अत्यधिक अंधकारमय तथा बहुत ही हिंसक जानवर भेड़िये, शेर तथा राक्षसों से घिरा होता है.

यहाँ से गुजरने वाली पापी एवं दुष्टात्माओं के लिए यह अत्यन्त कष्टकारी होता है.

यहां से प्रवेश करने वाली पापी आत्माओं के लिए यह अत्यंत कष्टकर होता है. इसे नरक का द्वार कहा जाता है. यम-नियम का पालन नहीं करने वाले निश्चित ही इस द्वार में प्रवेश करके कम से कम 100 वर्षों तक कष्ट झेलते हैं.

पश्चिम का द्वार : पश्चिम का द्वार रत्नों से जड़ित है. इस द्वार से ऐसे जीवों का प्रवेश होता है जिन्होंने दान-पुण्य किया हो, धर्म की रक्षा की हो और तीर्थों में प्राण त्यागे हो.

उत्तर का द्वार : उत्तर का द्वार भिन्न-भिन्न स्वर्णजड़ित रत्नों से सजा होता है, जहां से वही आत्मा प्रवेश करती है जिसने जीवन में माता-पिता की खूब सेवा की हो, हमेशा सत्य बोलता रहा हो और हमेशा मन-वचन-कर्म से अहिंसक हो.

पूर्व का द्वार : पूर्व का द्वार हीरे, मोती, नीलम और पुखराज जैसे रत्नों से सजा होता है. इस द्वार से उस आत्मा का प्रवेश होता है, जो योगी, ऋषि, सिद्ध और संबुद्ध है. इसे स्वर्ग का द्वार कहते हैं. इस द्वार में प्रवेश करते ही आत्मा का गंधर्व, देव, अप्सराएं स्वागत करती हैं.

पितृलोक :- हिन्दू शास्त्रों में पितृलोक का स्थान चंद्रलोक के उद्धव स्थान में माना गया है, ये आत्माएं मृत्यु के पश्चात 1 से 100 वर्षो तक जन्म एवं मृत्यु के मध्य की स्थिति में रहती है. पितृलोक के श्रेष्ठ पितरों को न्यायदात्री समिति का सदस्य माना जाता है.