अपने सम्पूर्ण जीवन में सिर्फ एक बार ही महादेव के इस अलौकिक धाम में जाने का साहस कर पाता है मनुष्य !

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आज तक हम यही सोचते आये है की महादेव की अमरनाथ यात्रा सबसे मुश्किल है, परन्तु क्या आप जानते है वास्तविकता में भगवान शिव का एक अन्य अति दुर्गम धाम है जहां की यात्रा अमरनाथ की यात्रा से भी कई गुना मुश्किल एवं खतरनाक है.

भगवान शिव का सबसे अलौकिक एवं चमत्कारिक कहे जाने वाला धाम किन्नर महादेव जिसकी यात्रा करने का साहस मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन में केवल एक बार ही कर पाता है.

तिब्बत के मानसरोवर कैलाश पर्वत के बाद किन्नर कैलाश पर्वत को ही संसार का दुसरा सबसे बड़ा कैलाश पर्वत कहा जाता है. जैसे ही सावन का महीना प्रारम्भ होता है हिमांचल की सबसे खतरनाक कहि जाने वाली किन्नर कैलाश यात्रा आरम्भ हो जाती है.

किन्नर कैलाश पर्वत के बारे में कहा जाता है की यह भगवान शिव का शीतकालीन प्रवास स्थल है. यह स्थान कई शताब्दियों से बौद्ध तथा हिन्दू अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है. तथा किन्नर कैलाश पर्वत दुर्गम स्थान में होने के बावजूद प्रत्येक वर्ष यहाँ लाखो के संख्या में श्रृद्धालु पधारते है.

मान्यता है की किन्नर कैलाश पर्वत में अद्भुत एवं अलौकिक देवीय शक्तियाँ है इस स्थान पर आप अद्भुत ब्र्ह्म कमल के अनेक पौधे के दर्शन कर सकते हो.

महादेव शिव की तपोस्थली किन्नौर के बौद्ध लोगो और हिन्दू भक्तो की आस्था का केंद्र किन्नर कैलाश की समुद्र तल से उचाई 24 हजार फिट है.

किन्नर कैलाश में स्थित भगवान शिव के शिवलिंग की उच्चाई 40 तथा चौड़ाई 16 फिट है. प्रत्येक वर्ष हजरो की संख्या में शिव भक्त जुलाई व अगस्त में जंगल व खतरनाक दुर्गम मार्ग से हो कर किन्नर कैलश पहुंचते है.

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यहाँ गणेश पार्क से कुछ दुरी पर स्थित पार्वती कुंड है, इस कुंड की एक अद्भुत मान्यता है यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा से इस कुंड में सिक्का डालकर अपनी कोई मनोकामना कहेगा तो वह निश्चित है पूर्ण होगी.

महादेव शिव के भक्त इस पवित्र कुंड में स्नान करने के बाद किन्नर कैलाश पर्वत की पवित्र यात्रा के लिए निकलते है, 24 घंटे की इस कठिन एवं दुर्गम यात्रा के पश्चात भक्त भगवान शिव के दुर्लभ दर्शन कर पाते है. अपनी यात्रा समाप्ति के पश्चात भक्त अपने साथ ब्र्ह्म कमल एवं औषधियाँ लेकर वापस लौटते है.

1993 से पहले इस स्थान पर आम लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध था. 1993 में पर्यटकों के लिए खोल दिया गया, जो 24000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. यहां 40 फीट ऊंचे शिवलिंग हैं.

यह हिंदू और बौद्ध दोनों के ‍लिए पूजनीय स्थल है. इस शिवलिंग के चारों ओर परिक्रमा करने की इच्‍छा लिए हुए भारी संख्‍या में श्रद्धालु यहां पर आते हैं.

किन्नर कैलाश पर्वत के संबंध में अनेक मान्यताएं प्रचलित है. पुराणों में इस पर्वत का संबंध महाभारत काल से जोड़ा गया है कहा जाता है की उस समय इस पर्वत का नाम इन्द्रकील था. यही पर भगवान शिव ने अर्जुन के साथ युद्ध किया था तथा अर्जुन को पाशुपतास्त्र की प्राप्ति हुई थी.

इस स्थान को लेकर यह भी मान्यता है की यहाँ पर पांडवो ने अपना वनवास बिताया था तथा भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त भस्मासुर भी यही भष्म हुआ था.

भगवान शिव का यह चमत्कारिक धाम अपना रंग परिवर्तन भी करता है. सूर्य उदय से पूर्व इस पर्वत का रंग सफेद होता है, सूर्य उदय के उपरांत इस पर्वत का रंग पिला हो जाता है, मध्यकाल में यह पर्वत लाल रंग का हो जाता है तथा संध्याकाल होते ही यह पर्वत काला हो जाता है.

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इस प्रकार यह पर्वत क्रमश सफेद, पिला, लाल तथा काला 4 प्रकार के रंग में परिवर्तित होता है. ऐसा क्यों होता है इस रहस्य को कोई भी अभी सही प्रकार से समझ नहीं पाया है. भक्तो के अनुसार यह देवीय चमत्कार है की किन्नर कैलाश पर्वत अपना रंग परिवर्तित करते रहते है वही कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है की यह एक सिफ्टकीय रचना है.

क्योकि किन्नर कैलाश पर्वत में विभिन्न कोणों से सूर्य की किरणे पड़ती है तो इन करने के प्रभाव से यह पर्वत ऐसा प्रतीत होता ही की वह अपना रंग बदल रहा है. किन्नर कैलाश पर्वत को एक ओर नाम से भी जाना जाता है और वह है रॉक कैसल. इसके साथ ही यह हिमांचल के बद्रीनाथ के नाम से भी प्रसिद्ध है.

किन्नर कैलाश पर्वत की परिक्रमा बहुत ही मुश्किल एवं जोखिम भरी है. परन्तु फिर अनेक व्यक्ति इस पर्वत की परिक्रमा करने का प्रयास करते है पुरे पर्वत की परिक्रमा करने में एक हफ्ते से लिकर 10 दिन तक लग जाते है.

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