जाने महाभारत काल के वे 5 प्रसिद्ध श्राप, जिनका प्रभाव आज भी कलयुग में बना हुआ है !

हमारे हिन्दू धर्म के वेदो एवं ग्रंथो के कथाओ में अनेक प्रकार के श्रापो का वर्णन आया है तथा इन श्रापो में कोई न कोई महत्वपूर्ण कारण अवश्य छुपा हुआ था. इन श्रापो में कुछ श्राप तो ऐसे थे जिसमे संसार की भलाई निहित थी परन्तु कुछ श्राप ऐसे भी थे जिन्होंने धार्मिक कथाओ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

आज महाभारत से संबंधित जिन कथाओ से संबंधित श्रापो के विषय पर में आपको बताने जा रहा हु वे केवल इतिहास तक ही सिमित नहीं रहे बल्कि उन श्रापो का प्रभाव वर्तमान में भी कायम है तथा जिन्हे प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है.

युधिस्ठर का दिया सभी स्त्रियों को श्राप :-

कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध की समाप्ति के पश्चात पांडवो की माता कुंती ने अपने पुत्रों को यह राज बताया की कर्ण उनका ज्येष्ठ भ्राता था. इस बात को सुनकर सभी पांडव शोकाकुल हो गए. हस्तिनापुर के राजा युधिस्ठर द्वारा अपने भाई कर्ण का विधि विधान द्वारा अंतिम संस्कार किया गया.

अपने भाई के मृत्यु से दुखी कर्ण ने अपनी माता के समीप जाकर पूरी स्त्री जाती को ही यह श्राप दे डाला की आज से कोई भी स्त्री किसी भी प्रकार के रहस्य एवं गोपनीय बात अपने भीतर छुपा कर नहीं रख सकेंगी.

श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप :-

सभी पांडव जब द्रोपदी के साथ जब स्वर्ग की और गए तो वे अपना सभी राजपाट अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के हाथो में सोप दिया. राजा परीक्षित ने अपने राज काल में प्रजा को किसी भी प्रकार के वस्तु की कमी नहीं आने दी.

एक बार राजा परीक्षित वन में आखेट खेलने को गए तभी उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए. वे अपनी तपस्या में लीन थे तथा उन्होंने मौन व्रत धारण क़र रखा था. जब राजा ने उनसे कई बार बोलने का प्रयास करते हुए भी उन्हें मौन पाया तो क्रोध में आकर उन्होंने ऋषि के गले में एक मारा हुआ सांप डाल दिया.

जब यह बात ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया की आज से सात दिन बाद राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हो जायेगी. राजा परीक्षित के जीवित रहते कलयुग में इतना साहस नहीं था की वह हावी हो सके परन्तु उनके मृत्यु के पश्चात ही कलयुग पूरी पृथ्वी पर हावी हो गया.

अश्वथामा को दिया गया भगवान श्री कृष्ण का श्राप :-

महाभारत युद्ध के अंत में जब अश्वथामा द्वारा पांडवो के समस्त पुत्रों का वध कर दिया गया तो पांडव भगवान श्री कृष्ण के साथ अश्वथामा का पीछा करते हुए ऋषि वेदव्यास जी के आश्रम में पहुंचे.
तब अश्वथामा ने पांडवो से पीछा छुड़ाने के लिए उन ब्र्ह्मास्त्र का वार किया. ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्र्ह्मास्त्र अश्वथामा पर छोड़ा.

पृथ्वी में प्रलय के भय से ऋषि वेदव्यास ने अर्जुन एवं अश्वथामा को ऐसा करने से रोका तथा दोनों से अपने अपने ब्र्ह्मास्त्र वापस लेने के लिए कहे. अर्जुन ने तो ब्र्ह्मास्त्र वापस ले लिया परन्तु अश्वथामा यह विद्या नहीं जानता था की ब्र्ह्मास्त्र वापस कैसे ले. तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ये विद्या नहीं जानता था. इसलिए उसने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी.

यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे और किसी भी जगह, किसी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी. तुम्हारे शरीर से पीब और लहू की गंध निकलेगी. इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे. दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे.

माण्डवय ऋषि का यमराज को श्राप :-

प्रसिद्ध गरंथ महाभारत में मांडव्य ऋषि का वर्णन है, एक बार नगर के राजा ने भूल से न्याय प्रक्रिया में गलती करते हुए ऋषि मांडव्य को शूली पर लटका दिया था. परन्तु बहुत समय तक शूली में लटकने पर भी जब वे जीवित रहे तो ऋषि को सिद्ध तपस्वी जान राजा को अपने गलती की अनुभूति हुए तथा उसने ऋषि मांडव्य को शूली से उतरवाया और उनसे क्षमा याचना करी.

इसके बाद ऋषि माण्डव्य यमराज से मिलने गए तथा उनसे पूछा की किस कारण मुझे झूठे आरोप में सजा मिली. जब आप 12 वर्ष के थे तो आपने एक छोटे से कीड़े के पूछ में सीक चुभाई थी जिस कारण आपको यह सजा भुगतनी पड़ी.

इस पर मांडव्य ऋषि यमराज पर क्रोधित होते हुए बोले की तुमने एक 12 वर्ष के बालक के किये के गये अपराध के आधार पर सजा सुनाई, इस अवस्था में मनुष्य को यह ज्ञान नहीं होता की क्या धर्म है और अधर्म अतः इस गलती के लिए में तुम्हे यह श्राप देता हु की तुम एक शुद्र परिवार में दासी के पुत्र के रूप में जन्म लोगे. ऋषि के इस कारण ही यमराज ने विदुर के रूप में महाभारत काल में जन्म लिया.

उर्वशी द्वारा अर्जुन को श्राप :-
महाभारत के दौरान एक बार अर्जुन स्वर्गलोक में इंद्र देव से दिव्यअस्त्र का ज्ञान लेने गए जहां उनकी भेट उर्वशी से हुई. उर्वशी अर्जुन को देख उन पर आकर्षित हो गई तथा उनके सम्मुख विवाह का प्रस्ताव रखा. परन्तु अर्जुन ने उर्वशी से कहा की वह उनके माँ समान है.

उर्वशी ने यह बात सुन अर्जुन से कहा की तुम क्यों नपुंसक की तरह बात कर रहे हो तुम्हारे इस व्यवहार के लिए में तुम्हे श्राप दे रही हु की तुम नपुंसक हो जाओ और स्त्रियों के बिछ नृतक की तरह रहो.

जब यह बात अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो वे अर्जुन को संतावना देते हुए बोले की तुम्हे घबराने की जरूरत नहीं है. यह श्राप निकट भविष्य में तुम्हारे लिए वरदान का काम करेगा, जब तुम्हे वनवास मिलेगा तब अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हे कौरवों के नजरो से बचाए रखेगा.