जाने माता सीता से जुड़े आश्चर्यचकित करने वाले ऐसे रहस्य जो आपने न पहले कभी पढ़ा होगा और न सूना !

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Sita :-

भगवान श्री राम को समर्पित सभी गर्न्थो में दो प्रसिद्ध ग्रन्थ है तुलसीदास द्वारा ( sita ) रचित ‘श्री रामचरित मानस’ और दूसरा वाल्मीकि कृत ‘रामायण’. इसके अलावा भी कुछ अन्य ग्रन्थ लिखे गए है पर इन सब में वाल्मीकि कृत रामायण को सबसे अलग और प्रामाणिक माना जाता है.

जबकि आज भी काफी कम लोग यह जानते है की श्री रामचरित मानस और रामायण में कुछ बातें अलग है लेकिन कुछ बातें ऐसी है जिनका वर्णन सिर्फ वाल्मीकि कृत रामायण में है. माता सीता ( sita ) के बारे में कुछ ऐसी बातें हैं जिनका उल्लेख सिर्फ वाल्मीकि कृत रामायण में ही मिलता है.

1. क्या आपको पता है सीता ( sita ) जी का विवाह किस उम्र में हुआ था? आपको बता दे श्रीराम से विवाह के वक्त सीता ( sita ) की आयु 6 वर्ष थी, इसका सही प्रमाण वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में इस प्रसंग से मिलता है. इस प्रसंग में सीता ( sita ) , साधु रूप में आए रावण को अपना सारा परिचय इस प्रकार देती हैं जानिए-

सीताजी कहती हैं कि मैं विवाह के पश्चात 12 साल तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में अपने पति के साथ हमेशा मनोवांछित सुख-सुविधाओं से संपन्न रही हूं.

और जब 13 साल के शुरू में महाराज दशरथ ने राजमंत्रियों से मिलकर सलाह की और श्रीरामचंद्रजी का राजकुमार पद पर अभिषेक करने का निर्णय किया.

लेकिन तभी कैकेयी ने मेरे ससुर को शपथ दिलाकर अपने वचन में बद्ध कर लिया, फिर दो वचन मांगे- मेरे पति (श्रीराम) के लिए वनवास और भरत (देवर) के लिए राज्याभिषेक.

वनवास के लिए जाते समय मेरे पति की आयु मात्र 25 वर्ष थी और मेरे जन्म काल से लेकर वनगमन काल तक मेरी अवस्था वर्ष गणना के मुताबित 18 वर्ष की हो गई थी.

अब इस प्रसंग से पता चलता है कि विवाह के बाद सीता ( sita ) 12 साल तक अयोध्या में ही रहीं और 18 वर्ष की आयु में थी जब वनवास पर जा रहीं थीं. इससे यही सिद्ध होता है कि विवाह के वक्त सीता ( sita ) की आयु मात्र 6 साल रही होगी.

साथ ही यह भी पता चलता है कि श्रीराम और सीता ( sita ) की उम्र में 7 वर्ष का अंतर था.

2. गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने के दौरान वह टूट गया, लेकिन सीता स्वयंवर का वर्णन वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में नहीं है.

वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान राम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ में मिथिला पहुंचे थे.

और श्रीराम को शिवधनुष दिखाने के लिए विश्वामित्र ने ही राजा जनक से कहा था. और तभी भगवान श्रीराम ने खेल ही खेल में उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया.

राजा जनक ने भी ये प्रण लिया हुआ था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता ( sita ) का विवाह कर देंगे. और वो प्रण पूरा श्रीराम के करने पर राजा जनक ने राजा दशरथ को बुलावा भेजा और विधि-विधान से सीता का विवाह श्रीराम से करवाया.

3. वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा जनक यज्ञ की जमीन तैयार करने के लिए हल से जमीन जोत रहे थे, उसी दौरान उन्हें भूमि से एक कन्या प्राप्त हुई. जोती हुई भूमि को तथा हल की नोक को ही सीता ( sita ) कहते हैं.

इस कारण इस बालिका का नाम भी सीता ( sita ) रखा गया.

4. श्रीरामचरित मानस में कहाँ गया है कि वनवास के समय श्रीराम के पीछे-पीछे सीता ( sita ) चलती थीं. और जब चलते समय सीता इस बात का खास ध्यान रखती थीं कि भूल से भी उनका पैर श्रीराम के पैरों के निशान पर न रखाएं. श्रीराम के चरण चिह्नों के बीच-बीच में पैर रखती हुई सीताजी ( sita ) चलती थीं.

5. और एक बार जब रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं पर जा रहा था, तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम वेदवती था. और वो भगवान विष्णु को अपने पति स्वरूप में पाने के लिए कठिन तपस्या कर रही थी.

रावण उसके पास गया एवं उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा. उस तपस्विनी ने तभी रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी, इतना कहकर वह स्त्री अग्नि में समा गई. उसी स्त्री ने दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया. वाल्मीकि रामायण का ये प्रसंग है.

6. वाल्मीकि रामायण के हिसाब से रावण ने सीता ( sita ) का हरण अपने रथ से किया था. और ये दिव्य रथ सोने का बना था, इसमें गधे जूते थे और वह गधों के समान ही आवाज करता था.

7. रावण जिस दिन सीता ( sita ) का हरण कर अपनी अशोक वाटिका में लाया. उसी रात भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के लिए खीर लेकर यहां आए, पहले देवराज ने अशोक वाटिका में सभी राक्षसों को बेहोस कर सुला दिया था. उसके बाद माता सीता ( sita ) को खीर अर्पित की, जिसके खाने मात्र से सीता की भूख-प्यास बिल्कुल शांत हो गई थी. और वाल्मीकि रामायण में ही यह प्रसंग मिलता है.

8. श्रीराम व सीता का विवाह मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को हुआ था. श्रीराम-सीता ( sita ) के विवाह के उपलक्ष्य में हर वर्ष इसी तिथि पर विवाह पंचमी का पर्व मनाया जाता है. श्रीरामचरित मानस में यह प्रसंग मिलता है.

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