लंकापति रावण के पास थी 72 करोड़ की सेना फिर भी 8 दिन में ही समाप्त हो गया रामायण का युद्ध, रामायण के रोचक रहस्य !

Ramayana story in hindi :-

रामायण का युद्ध ( ramayan yudh ) अश्विन पक्ष की तृतीया तिथि को आरम्भ हुआ था तथा 8 दिन तक चलने वाला यह भयंकर युद्ध प्रभु श्री राम ने दशहरे के दिन यानि दशमी को रावण के वध के साथ समाप्त किया.

यदि आप सोचते है की रामायण ( ramayan yudh ) का यह युद्ध सिर्फ रातो रात ही हो गया तो में आपको बता दू की वे राते इतनी लम्बी थी की जिसका अंदाजा आप और में नहीं लगा सकते ये तो सिर्फ देवता ही जानते है .

इस बात का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है की लंका नरेश रावण के सेना की संख्या 72 ,0000000 ( बहत्तर करोड़ ) थी, इसके बाद भी प्रभु श्री राम ने वानरों की सेना के सहारे केवल 8 दिनों में ही समस्त राक्षस सेना का अंत कर दिया था और रावण को पराजय का समाना करना पड़ा था.

युद्ध में श्री राम एक बार और लक्ष्मण दो बार रावण के पुत्र मेघनाद से परास्त हुए थे परन्तु फिर भी रावण ने अपनी मर्यादा कायम रखी तथा राम और लक्ष्मण के अपहरण हो जाने व लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर भी उसने राम की सेना पर आक्रमण नहीं किया.

रावण के सेना में एक से बढ़ कर एक महारथी थे, खुद रावण के साथ पुत्रों एवं उसके कई भाइयो ने युद्ध में सेना नायक की भूमिका निभाई.

रावण के कहने पर उसके अत्यन्त मायावी भाई अभिरावण एवं महिरावण ने भी श्री राम और लक्ष्मण को अपहृत करने का प्रयास किया तथा छल से उनके वध करने की कोशिश करी.

रावण को स्वयं ब्र्ह्मा का वरदान प्राप्त था, वह दशग्रीव था तथा इसके साथ ही उसके नाभि में अमृत था जिसके कारण लगभग वह अमर था.

रावण का पुत्र अतिक्या जो अपने माया के प्रभाव से जब तक चाहे तब तक अदृश्य हो सकता था. अपने अदृश्य होने के कारण उसने अनेको युद्ध मात्र कुछ क्षणों में ही जीते थे. अगर उसके वध का रहस्य देवराज इंद्र लक्ष्मण को न बताते तो उसकी मृत्यु होना लगभग असम्भव था.

अत्यन्त बलशाली कुम्भकर्ण जिसे स्वयं देवऋषि नारद जी ने शास्त्रों का ज्ञान दिया था तथा देवराज इंद्र भी जिससे ईष्या रखते थे, अपने भाई रावण के आदेश का पालन करने के लिए अपने प्राणो की आहुति दी.

रावण का पुत्र व महायोद्धा मेघनाद जो गुरु शुक्राचार्य का शिष्य था तथा शुक्राचार्य ने उसे कई देवास्त्रो का ज्ञान दिया था.

मेघनाद ने स्वर्गलोक को जीतकर स्वयं देवराज इंद्र को तक अपना बंदी बनाया था तथा ब्रह्म देव के आदेश पर इंद्र देव के प्राण बचे थे व ब्रह्म देव ने ही मेघनाद को महायोद्धा एवं इंद्रजीत की उपाधि दी थी.

जब मेघनाद अपने कुलदेवी की तपस्या करता था तो उस समय लगभग अमर हो जाता था. स्वयं त्रिदेव भी उसके तपस्या करते वक्त वध नहीं कर सकते थे.

मेघनाद यह जानता था की उसके पिता अधर्म के मार्ग पर है जिसके लिए उसने अपने पिता को समझने की चेष्टा करी थी , परन्तु रावण का घमंड अटल था अतः अपना पुत्रधर्म निभाते हुए मेघनाद ने भी लक्ष्मण के साथ हुए युद्ध में अपने प्राणो की आहुति दी.

अद्भुत एवं विचित्र मायावी शक्तियों के स्वामी अभिरावण एवं महिरावण दोनों रावण के भाई थे. रावण के आदेश पर उन्होंने शिविर में सोये हुए राम एवं लक्ष्मण का अपहरण कर लिया.

तथा वे अपने कुलदेवता को प्रसन्न करने के लिए दोनों भाइयो की बलि चढ़ाने का प्रबंध करने लगे. परन्तु हनुमान जी ने राम एवं लक्ष्मण को उन राक्षसों से मुक्त कर उन दोनों की ही बलि चढ़ा दी.

इस सब से ऊपर स्वयं रावण था जिसने एक बार महादेव के ही निवास स्थान कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओ से उठा लिया था. यदि रावण में अधर्म ना होता तो वह देवलोक का भी स्वामी बन जाता.

पुराणों के अनुसार रावण भगवान विष्णु के धाम का द्वारपाल था तथा ब्र्ह्मा के दस मानसपुत्रों के श्राप के कारण उसने पृथ्वी में जन्म लिया था.

युद्ध के समय भगवान श्री राम भी उसके पराक्रम से आश्चर्यचकित व परेशान हो गए थे. रावण राम की सेना पर हावी होने लगा था, अंत में विभीषण के दवारा रावण के मृत्यु का रहस्य बताने पर श्री राम ने उसका वध किया.

ऐसे बहुत से विस्मयकारक है जो रामायण ( ramayan yudh ) के युद्ध को महान बनाते है, बशर्ते युद्ध आठ दिन ही चला लेकिन वो आठ दिन रामसेना के लिए कितने भारी थे उसके कुछ उदहारण भर दिए है हमने .

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