अकेले ही 60 ,000 योद्धाओं को पल भर में मसल सकता था यह योद्धा, पिता जन्मे थे बाणों के साथ !

Kripacharya :-

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महाभारत के आदिपर्व में एक ऐसे योद्धा की कथा मिलती है जो अद्भुत शक्तियों से सम्पन्न महाभारत( kripacharya ) के प्रमुख पात्रो में से एक था. महान ऋषि गौतम के पुत्र थे शरदवान जो अपने जन्म के समय ही बाण के साथ पैदा हुए थे जो यह सूचक था की वे एक वीर योद्धा थे.

अपने पिता ऋषि गौतम के भाति शरद्वान का मन जप-तप में नहीं लगता था वे अपना अधिकत्तर समय धनुर्विद्या के अभ्यास में लगाते थे. उस समय उनके समकालीन कोई ऐसा योद्धा नहीं था जो उन्हें युद्ध की चुनौती दे.

बड़े-बड़े योद्धाओं को युद्ध में उनसे पराजय का सामना करना पड़ा. यहाँ तक देवराज इंद्र भी उनकी धनुविर्द्या देख अचम्भित हो गए तथा उन्हें यह भय सताने लगा की कहि शरद्वान उनसे स्वर्गलोक ना छीन ले.

अपने भय के कारण देवराज इंद्र ने स्वर्गलोक से जानपदी नामक देवकन्या को पृथ्वी लोक यह आदेश देकर भेजा की वह शरद्वान के ध्यान को भटकाए.

जब शरद्वान अपने धनुर्विद्या में व्यस्त थे उस समय वह अप्सरा उनके सम्मुख आई तथा अपनी सुंदरता से उन्हें लुभा ने लगी. स्वर्ग से आई उस अप्सरा की सुंदरता को देख शरद्वान उस पर आकर्षित हो गए.

शरद्वान का ध्यान जैसे ही भटका उनके धनुष बाण अपने आप ही अदृश्य हो गए.

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उस अपश्रा से शरद्वान को दो जुड़वा बच्चे प्राप्त हुए. जब शरद्वान को अपनी भूल का अहसास हुआ तो पछाताप के लिए वन में तपश्या करने चल दिए.

इधर क्योकि अप्सरा का भी वह कार्य पूर्ण हो चुका था जिसके लिए इंद्र ने उसे भेजा था अतः वह भी उन दोनों बच्चों को छोड़ स्वर्गलोक चली गई.

संयोग से उसी समय हस्तिनापुर के नरेश शांतुन वन में आखेट के लिए आये तथा बच्चों के रोने के आवाज उनके कानो तक पहुंची. वे बच्चों के रोने के आवाज की दिशा में जब आगे बढ़े तो कुछ दुरी पर ही उन्हें दो बच्चे धरती में लेटे हुए व रोते हुए दिखाई दिए.

उन मासूम बच्चों को देख राज शांतुन ने उन्हें अपने गोद में उठा लिया और अपने साथ हस्तिनापुर ले गए.

उन्होंने बच्चे का नाम रखा कृपा था बच्ची का नाम कृपी ( kripacharya )  राजा शांतुन के देख रख में वे दोनों बच्चे बड़े हुए तथा उनकी शिक्षा दीक्षा राजमहल में ही होती थी.

बच्ची जप बड़ी हुई तो उसका विवाह पांडवो और कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य से किया वहीं बच्चा बड़ा होकर कृपाचार्य ( kripacharya )  के नाम से विख्यात हुआ तथा हस्तिनापुर राज्य का राजगुरु बना.

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कृपाचार्य ( kripacharya )  भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत थे. महाभारत की कथा अनुसार वे एक साथ 60 ,000 योद्धाओं से लड़ सकता है.

वे ( kripacharya )  कुरक्षेत्र में हुए महाभारत युद्ध में कौरवों की तरफ से लड़े थे तथा इस युद्ध में ज़िंदा बच्चे 18 महायोद्धाओं में से एक थे. कहा जाता ही वे भी उन आठ महापुरुषों में से एक है जिन्हे अमरता का वरदान था तथा ये अभी भी इस मृत्युलोक में जीवित है.

कृपाचार्य ( kripacharya )  कौरवों के युद्ध में पराजित हो जाने के बाद पांडवो के पास आ गए थे. भागवत के अनुसार सावर्णि मनु के समय कृपाचार्य ( kripacharya )  की गणना सप्तर्षियों में होती थी.