Mandir ki parikrama kyu karte hain:

परम्परागत रूप से हम मदिर की पूजा आराधना के बाद देवी-देवताओ या मंदिर की परिक्रमा करते है तथा यह परम्परा कई वर्षो से ऐसे ही चली आ रही है फिर भी अधिकांश लोग बिना इसकी महत्ता जाने मंदिर की परिक्रमा करते है. धर्म ग्रंथो के अनुसार देवी-देवताओ की पूजा के बाद मंदिर की परिक्रमा अनिवार्य है क्योकि इसके पीछे न केवल धर्मिक मान्यता बल्कि वैज्ञानिक मान्यता भी है. देवी-देवताओ के पूजा के बाद मंदिर की परिक्रमा एक तय संख्या में ही की जानी चाहिए, बिना विधि-विधान के की गई पूजा एवं परिक्रमा के कारण फल प्राप्ति में कमी आ सकती है.

पूजा आरधना के साथ ही मंदिर की परिक्रमा करने के पश्चात पूजा पूर्ण मानी जाती है तथा इसके प्रभाव से अक्षय पूण्य की प्राप्ति होती है. हर बुराई और पापो से मुक्ति मिलती है व घर में सुख सम्पदा आती है. देवी-देवताओ के पूजा पाठ एवं परिक्रमा से संबंधित एक कथा गणेश जी के संबंध में भी है जब उनसे और उनके भाई कार्तिकेय से संसार के चक़्कर लगाने को कहा जाता है तो गणेश भगवान अपने माता-पिता शिव और पार्वती के ही चक्कर लगाते है तथा संसार की परिक्रमा पूरी हो जाने की बात कहते है.

आरती पूजा मन्त्र तथा जप के प्रभाव से मंदिर में एक सकरात्मक ऊर्जा उतपन्न होती है. जब हम मंदिर की परिक्रमा करते है तो हमे मंदिर में उपस्थित सकरात्मक ऊर्जा अधिक मात्रा में मिलती है इसी कारण मंदिर में पूजा व आराधना के बाद श्रृद्धालु अत्यधिक शांत एवं सुख का अनुभव करते है. यह सकरात्मक ऊर्जा हमे देवीय शक्तियों से जोड़ते है तथा हमारे आस-पास के वातावरण को भी सकरात्मक बनाते है. परिक्रमा के माध्यम से हम देवीय शक्तियों को ग्रहण करते है तथा हमारे मस्तिक से हर प्रकार के नकरात्मक विचार दूर होते है. इसके प्रभाव से हमारा शरीर ऊर्जावान होता है अतः इसी वजह से परिक्रमा की मान्यता बनाई गई है.

मंदिर परिक्रमा सही दिशा में और सही तरीके से ही की जानी चाहिए. ध्यान रखें कि जब आप मंदिर की परिक्रमा शुरू करें तो हर समय भगवान की प्रतिमा आपके दाईं ओर रहनी चाहिए. इसका सीधा–सा तरीका है कि हमेशा अपने बाएं हाथ की ओर से मंदिर की परिक्रमा शुरू करें. मंदिर की परिक्रमा हमेशा घड़ी की सूई की दिशा में होनी चाहिए, मतलब जैसे घड़ी की सूई घूमती है, उसी तरह साधक को घूमना चाहिए. साथ ही जिस देव की परिक्रमा कर रहे हैं उसके मंत्र का जाप करते रहें.भगवान गणेश की पूजा करते समय मंदिर की एक परिक्रमा तथा शिवजी की पूजा के समय मंदिर की 2 परिक्रमा करनी चाहिए. इसी प्रकार यदि पूजा भगवान विष्णु की हो तो मंदिर की 3 परिक्रमा करनी चाहिए और दुर्गा माता की पूजा के समय मंदिर की 6 परिक्रमा करनी चाहिए.

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