जानिए भगवान श्री कृष्ण से जुड़े कुछे अनोखे रहस्य एवं रोचक तथ्य !

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भगवान श्री कृष्ण विष्णु के अवतार है तथा सनातम धर्म में विष्णु भगवान को जगत के पालनकर्ता व मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देव बताया गया है. भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण का जन्म मथुरा के कारावास में देवकी के गृभ से हुआ था तथा उनका पालन पोषण यशोदा के यहाँ गोकुल में हुआ था. भगवान श्री कृष्ण ने अपने जीवन काल में अनेक लीलाएं रची जो अत्यन्त अद्धुत एवं आशचर्यचकित करने वाली थी. इसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण के संबंध में भी अनेक ऐसे पहलू है जो बेहद रोचक और अनोखे है आइये जाने उनके जीवन से जुड़े इन अद्भुत बातो को.

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1 . श्री कृष्णा के जन्म के तथा उनकी आयु के संबंध में पुराणों और ज्योतिषों के मत एक नहीं है, पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण के आयु 125 वर्ष बताई गई है वही ज्योतिषों के मतानुसार भगवान कृष्ण की आयु 110 वर्ष थी. व्यक्तिगत रूप से दूसरे मत को अधिक उचित बतलाया गया है. भगवान श्री कृष्ण के पुरे शरीर का रंग मेघश्यामल था यही कारण था की उनके शरीर से हर समय एक मादक गंध स्त्रावित होती थी जिसे अपने गुप्त अभियान में होने के कारण उन्हें हर समय दूसरों से छुपाना पड़ता था. अज्ञातवास में उन्होंने सैरंध्री का कार्य चुना था ताकि चन्दन, उबटन के सुगन्धों के मध्य उनकी वास्त्विक गंध छुपी रहे.

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2 . भगवान श्री कृष्ण के मनुष्य रूप त्यागने था वैकुंठ धाम गमन से पूर्व एक भी केश श्वेत नहीं थे तथा उनके चेहरे पर कोई भी झुरिया नहीं थी. पुराणों के अनुसार भगवान श्री कृष्णा की दूसरी माता रोहणी (बलराम की माता) व उनकी परदादी ”नाग” जनजाति की थी. भगवान श्री के जन्म के समय मथुरा के कारावास में उनको यशोदा को पुत्री के रूप में प्राप्त हुई जिस कन्या से बदला गया था उसका नाम एकनंशा था, जिनकी आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजा होती है.

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3 . भगवान श्री कृष्ण और राधा की रास-लीला तथा उनकी प्रेम गाथा जगत प्रसिद्ध है परन्तु फिर भी राधा का वर्णन महाभारत, हरिवंशपुराण तथा भागवत जैसे प्रमुख गर्न्थो में कहि नहीं है. उनका उल्लेख सिर्फ बृह्मवैवतृ पुराण, गीतगोविन्द जैसे जनश्रुतियो में ही मिलता है. जैन परम्परा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के चचेरे भाई का नाम तीर्थकर नेमिनाथ था जिन्हे हिन्दू धर्म में घोर अंगिरस के नाम से जाना जाता है. भगवान श्री कृष्ण ने द्वारिका नगरी का निर्माण किया परन्तु वे अंतिम माह के आलावा कभी भी द्वारिका में 6 माह से अधिक नहीं रुके. भगवान श्री कृष्ण ने अपनी आरम्भिक शिक्षा उज्जैन में संदीपनी आश्रम में पूरी करी थी, मात्र कुछ माह में ही वे सभी प्रकार की शिक्षा में पारंगत हो गए थे.

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4 . ऐसा माना जाता है की प्रसिद्ध मार्शल आर्ट की कला का विकास भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज के वनों में किया था तथा इसी का नृत्य रूप डांडिया रास कहलाता है. ”कलारीपट्टु” की कला को उतपन्न करने वाले पहले व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण ही थे तथा उनकी नारायणी सेना भारत के सबसे पहली भयंकर प्रहारक सेना थी. भगवान श्री कृष्ण के रथ का नाम ”जैत्र” था तथा उनके सारथि का नाम दारुक/बाहुक था. उनके रथ में प्रयोग में आने वाले अश्वो का नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक था.

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5 . भगवान श्री कृष्ण के धनुष का नाम शारंग तथा अत्यधिक शक्तिशाली अस्त्र का नाम सुदर्शन चक्र था जिसकी बराबरी केवल दो विध्वंसक अस्त्र पाशुपतास्त्र ( जो भगवान शिव, कृष्ण तथा अर्जुन के पास थे) और प्रस्वपास्त्र ( भगवान शिव , भीष्म तथा श्री कृष्ण के पास थे ) कर सकते थे. भगवान श्री कृष्ण के खड़क का नाम ”नंदक”, उनके गदा का नाम ”कौमोदकी” तथा शंख का नाम ”पांचजन्य” था जो गुलाबी रंग का था.

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6 . भगवान श्री कृष्ण का सबसे भयंकर युद्ध अर्जुन के साथ हुआ था जो सुभद्रा के प्रतिज्ञा के कारण था जिनमे दोनों ने अपने सबसे भयानक अस्त्र सुदर्शन चक्र एवं पाशुपतास्त्र का प्रयोग किया था. दोनों के अस्त्रों का टकराव पूरी सृष्टि में प्रलय लाने के लिए पर्याप्त था परन्तु अंत में प्रलय को रोकने के लिए देवी देवताओ ने कृष्ण और अर्जुन दोनों के मध्य संधि कराई थी.

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7 . भगवान श्री कृष्ण ने कई भयंकर युद्धों का संचालन किया परन्तु इनमे सर्वाधिक भयंकर थे 1 – महाभारत 2 – जरासंध व कालयवन का वध 3 – नरकासुर के विरुद्ध युद्ध.

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8 . भगवान श्री कृष्ण ने बाणासुर तथा शिव से युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्ण्व ज्वर का प्रयोग किया था जो विश्व का प्रथम ”जीवाणु युद्ध” था.

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