पुराणों में छिपी इस कथा में है शनि देव की दृष्टि के नीचे रहने का रहस्य !

Story of shani dev :

(Story of shani dev) एक बार कैलाश पर्वत में हर जगह उत्साह और आनंद का माहौल था व इस उत्साह का कारण था माता पार्वती ( Shiva Parvati ) के पुत्र गणेश का जन्म. महादेव शिव ( Lord Shiva ) और पर्वती को उनके पुत्र गणेश के जन्म की बधाई देने सभी देवता, ऋषि-मुनि, सूर्य-चन्द्रादि , सिद्धगण व पर्वत आदि कैलाश पर्वत पधारे हुए थे. शनिदेव (Shani Devभी इन सब के साथ कैलाश पर्वत आये थे परन्तु वे इन सबके पीछे खड़े थे. उनका मुखमंडल अति नम्र था तथा उन्होंने अपनी आँखे नीचे जमीन की ओर कर रखी थी व भगवान श्री कृष्ण ( Lord Krishna ) के भक्ति में लीन थे. वे तप, तेजस्वी, धधकती अग्नि शिखा के समान तेजवान, सुन्दर श्यामवर्णी, श्रेष्ठ थे और पीताम्बर धारण किये थे.

 

Story of shani dev

सर्वप्रथम (Story of shani dev) शनि देव Shani Stotra  ने कैलाश पर्वत पहुंचकर ब्र्ह्मा, विष्णु , महेश, ऋषिगन और सूर्यादि को प्रणाम किया तथा इसके बाद वे उस स्थान पर पहुंचे जहाँ माता पार्वती अपने पुत्र गणेश के साथ उनके सखियो से घिरी हुई थी. माता पार्वती के पास पहुंच शनि देव ने माता पार्वती को नमन किया तथा उनसे आशीर्वाद गर्हण किया. परन्तु शनि देव ने शिशु गणेश ( Lord Ganesh ) की ओर एक बार अपनी नजरे घुमाने का प्रयास तक नहीं किया. शनि देव को नीचे की ओर मुंह करें देख माता पार्वती ने उनसे पूछा इस खुसी के अवसर पर आपने अपना मुंह क्यों झुका रखा है, आखिर तुम मेरे बालक की ओर क्यों नहीं देख रहे ?

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तब शनि देव ( Shani Dev Mantra ) ने कहा की हे माते ! सभी जन अपने कर्मो का फल भोगते है, कर्म चाहे जैसा भी हो परन्तु करोड़ो वर्षो कल्पो तक क्षय नहीं होता. अपने कर्मो के अनुसार ही जीव ब्र्ह्मा, सूर्य ( Surya Dev ) , देव आदि का स्थान पाता है तथा अपने कर्मो के अनुसार ही वह मनुष्य, वृक्ष, जीव-जन्तु आदि के योनि में आता है. अपने कर्मो के कारण ही प्राणी नरक और स्वर्ग भोगता है. कर्मो के कारण ही मनुष्य राजा बनता और उसी के कारण वह दास बनता है. कर्म ही मनुष्य को धनी बनाता है और यही निर्धन.

Story of shani dev

आज में आपको यह रहस्य बताता हु की क्यों मेरी दृष्टि नीचे रहती है. (Story of shani dev) हे माते! मेरी बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण ( Lord Krishna ) के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रही है. में हर समय भगवान कृष्ण की ही भक्ति में लगा रहता था. विषय भोगो से विरकत में हर समय उनकी तपस्या में लीन रहता था. जब में विवाह योग्य हुआ तो मेरे पिता ( सूर्यदेव ) ने मेरा विवाह चित्ररथ गन्धर्व की कन्या से कर दिया. वह तेजस्वनी सती साध्वी भी सदैव तपस्या में लीन रहती थी. एक दिन वह ऋतू स्नान कर मेरे समीप आई उस समय में भगवत चिंतन में लीन था. उस समय मुझे बाहरी ज्ञान बिल्कुल भी ज्ञात नहीं था. उस समय उस साध्वी ने अपना ऋतुकाल व्यर्थ जाता देख मुझे श्राप दिया की आज से तुम्हारी दृष्टि सदैव नीचे ही रहेगी यदि तुमने किसी पर अपनी दृष्टि डालने का भी प्रयास किया तो उसका अवश्य नाश होगा.

यही कारण है माते की में सदैव अपनी दृष्टि नीचे किेए रहता हु, कहि मेरे कारण जीव हिंसा न हो जाये.और यही कारण है की में बालक गणेश ( Ganesha ) पर भी अपनी दृष्टि नहीं डाल सकता.

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इस चमत्कारिक मंदिर में शनिदेव का अभिषेक तेल से नही बल्कि दूध और पानी से होता है !

आखिर सूर्य देव ने क्यों किया शनि देव को अपने पुत्र मानने से इन्कार ?