जाने पापमोचनी एकादशी का महत्व और इस से जुडी कथा !

चैत्र माह के कृष्ण पक्ष को पड़ने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहा जाता है तथा इस व्रत के फल के प्रभाव से मनुष्य को वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है व उसके समस्त पापो से उसे मुक्ति मिलती है. इस एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है तथा पुराणों के अनुसार यह व्रत मोक्ष के मार्ग को खोलने वाला बताया गया है. नारद पुराण में इस व्रत के विषेशता बताते हुए कहा गया है की यह व्रत हजारो अश्वमेघ्य यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञ से भी अधिक फलदायी है.

भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं इस व्रत के फल एवं प्रभाव को अर्जुन को एक कथा के माध्यम से समझाया था. एक बार च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी, भगवान शिव की आरधना करने के लिए एक पर्वत की उच्ची चोटी पर गए ताकि उनके साधना में कोई बाधा न आ सके. उस पर्वत पर तप करते-करते ऋषि मेधावी को कई वर्ष बीत गए, एक दिन एक मंजुघोषा नाम की अप्सरा आकाशमार्ग में भ्रमण कर रही थी तभी उसकी नजर ऋषि मेधावी पर पड़ी तथा वह ऋषि के मुख के तेज को देखकर उन पर मोहित हो गई. मंजुघोषा के माया के प्रभाव से ऋषि मेधावी ने अपनी साधना छोड़ दी तथा उस अप्सरा के साथ समय बिताने लगे. जब एक दिन उस अप्सरा की माया का प्रभाव ऋषि पर से हटा तो उन्हें अहसास हुआ की वे शिव की तपस्या से विरक्त हो चुके है. क्रोध में आकर उन्होंने उस अप्सरा को पिशाचनी होने का श्राप दे दिया.ऋद्धि मेधावी के क्रोध शांत होने के पश्चात तथा अप्सरा के प्राथना पर ऋषि मेधावी ने अप्सरा को उसकी मुक्ति का मार्ग बताते हुए चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत करने के लिए कहा तथा स्वयं भोग में विलुप्त होने के कारण ऋषि मेधावी के भी समस्त पूण्य नष्ट हो चुके थे. पापमोचनी एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि मेधावी को अपने सभी पापो से मुक्ति मिली तथा अप्सरा इस व्रत के प्रभाव से पिशाचिन योनि से मुक्त हुई व उसे स्वर्ग में पुनः स्थान प्राप्त हुआ.

पापमोचनी एकादशी के दिन प्रातः काल जल्दी उठकर व स्नान आदि से निर्मित होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा करनी चाहिए. भगवान विष्णु के प्रतिमा के समक्ष धुप, दिप, नवैद्य, फल व फूल आदि चढ़ाकर भागवत कथा का पाठ करना चाहिए तथा इस एकादशी के सारे दिन भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करना चाहिए. इस व्रत की रात्रि में भगवान विष्णु के पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए व एकादशी के अगले दिन ब्राह्मण आदि से पाठ कराकर तथा उन्हें दान-दक्षिणा देकर व्रत का समापन करना चाहिए. यह सब कार्य करने के पश्चात स्वयं भोजन करना चाहिए !

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