महाभारत के ऐसे तीन सर्वाधिक बुद्धिमान पात्र, जिनके पास था हर विपदा से निकलने का समाधान !

Mahabharat vidur, yudhishthir, krishna

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वेदव्यास द्वार रचित ”महाभारत” एक महान काव्यग्रन्थ है जिसमे बताया है की अधर्म चाहे कितना भी जोर लगा ले परन्तु विजय अंत में धर्म की ही होती है. महाभारत में अनेको बड़े-बड़े दिग्गजों और योद्धाओं का वर्णन आया है जिनमे प्रमुख तीन पात्रो का भी वर्णन है जिनके पास ऐसा सामर्थ्य था की वह हर प्रकार की बुरी से बुरी व कठिन परस्थितियों का समाना बड़े ही आसानी से कर सकते थे. तीनो की बुद्धिमता का कोई तोड़ नहीं था और ये तीनो महाभारत के अन्य पत्रों की तुलना में सबसे अधिक बुद्धिमान एवं विद्वान् माने गए है.

श्लोक :-
न हि बुद्धयान्वितः प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः।
निमज्जत्यापदं प्राप्य महतीं दारुणमपि।।

अर्थात चाहे विपत्ति कितनी भी भयंकर क्यों न हो परन्तु बुद्धिमान, विद्वान एवं नीतिशास्त्र में निपुर्ण व्यक्ति कभी भी किसी विपत्ति में नहीं फसता, वह किसी न किसी तरह कठिन परिस्थिति में भी अपने लिए मार्ग निकाल ही लेता है.

विद्वान विदुर :- कहा जाता है की जब दुर्योधन का जन्म हुआ था तो वह बहुत जोर-जोर से गीदड़ की आवाज निकालते हुए रोने लगा और शोर मचाने लगा. विदुर महा विद्वान थे तथा उन्होंने अपने ज्ञान से यह जान लिए था की दुर्योधन ने अपने कुल का सर्वनाश करने के लिए जन्म लिया है अतः उन्होंने दुर्योधन को देखते ही धृतराष्ट्र को उसे त्याग दें की सलाह दी थी. उन्होंने धृतराष्ट्र को पहले ही इस सत्य से अवगत करा दिया था की उनका यह पुत्र कौरव वंश के विनाश का कारण बनेगा परन्तु अपने पुत्र प्रेम में पड़े होने के कारण ध्रतराष्ट्र ने विदुर की बात नहीं सुनी.

विदुर के बारे में यह भी कहा जाता है की यदि वे कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ते तो पांडवो को पराजित होने से कोई नहीं रोक सकता था. विदुर के पास एक ऐसा अस्त्र था जो अर्जुन के गांडीव से भी कई गुना अत्यधिक शक्तिशाली था. भगवान श्री कृष्ण के चली एक चाल के कारण ही विदुर ने अपने अस्त्र तोड़ दिए थे तथा युद्ध में शामिल न होने का फैसला लिया था. दरसल जब भगवान श्री कृष्ण पांडवो और कौरवों के मध्य सलाह करवाने हस्तिनापुर आये तो दुर्योधन ने उनके रहने की व्यवस्था एक विशेष स्थान पर करा दी. परन्तु कृष्ण ने दुर्योधन के स्थान को ठुकराकर विदुर एवं उनके परिवार के साथ रहने का निर्णय किया. जब अगले दिन दरबार में कृष्ण पांडवो का पक्ष ले रहे थे तब दुर्योधन ने विदुर पर भी आरोप लगाया की वह उसके दुश्मन पांडवो से मिला हुआ है. उस पर क्रोध में आकर विदुर ने कहा यदि दुर्योधन उन पर विस्वाश नहीं करता तो वे युद्ध में उसके तरफ से नहीं लड़ेंगे और उन्होंने उसी क्षण अपने अस्त्र तोड़ दिए.

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युधिस्ठर :- धर्मपुत्र युधिस्ठर को भी नीतिशास्त्र और ज्ञान में निपुर्ण बताया गया है उन्हें इतना विद्वान माना जाता है की एक बार स्वयं यमराज ने यक्ष के रूप में उनके बुद्धिमानी की परीक्षा ली थी. उन्होंने महाभारत का आधा युद्ध तो उसके के आरंम्भ होने से पूर्व ही जीत लिया था. युद्ध शुरू होने के पूर्व युधिस्ठर अपने रथ से उतरकर तेजी से शत्रु पक्ष की ओर बढ़ने लगे जिसे देख सभी आश्चर्यचकित हो गए. युधिस्ठर अपने दोनों हाथ जोड़े भीष्म पितामह के समीप पहुंचे और बोले पितामह मुझे युद्ध में आपके विरुद्ध शस्त्र उठाने में बहुत अप्रिय प्रतीत हो रहा है परन्तु में विवश हु. पितामह आपके चरणों के इस दास का प्रणाम कृपया स्वीकार करें. युधिस्ठर की विन्रमता को देख भीष्म पितामह गदगद हो गए तथा उन्हें इस युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद दिया और अपने परास्त होने का रहस्य भी समय आने पर बताया. इस तरह युधिस्ठर ने अपने सभी आदरणीय व्यक्तियों द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और शलयराज को प्रणाम कर उनके आशीर्वाद द्वारा युद्ध में अपनी विजयी को और भी अधिक पका किया.

श्री कृष्ण :- श्री कृष्ण एक बहुत ही सफल नीतिकार थे, उन्होंने अपने नीतियों के बल पर अनेक असम्भव कार्य किये. कौरव हमेशा पांडवो के विरुद्ध कूट नीतियाँ चल कर उन्हें फ़साने का प्रयास करते परन्तु श्री कृष्ण हमेशा अपने निति ज्ञान से उन्हें बचा लेते. यदि पांडवो के पास श्री कृष्ण जैसे नीतिकार मित्र न होते तो उनको महाभारत के युद्ध में विजय होना असम्भव था. इन्ही के भाति यदि कोई व्यक्ति नीतिशास्त्र में निपुर्ण और बुद्धिमान है तो वह हर प्रकार के कठिन परिस्थितियों का समाना आसानी से कर सकता है.

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