जाने आखिर क्यों भगवान श्री कृष्ण ने “एकलव्य” का किया था वध ?

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एकलव्य ( ekalavya )  भी इतनी जल्दी हार मानने वाले में से न था अतः उसने आश्रम से ही कुछ दुरी पर जाकर गुरु द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा बनाई तथा वह उनके प्रतिमा के सामने अपने धनु-विद्या का अभ्यास करने लगे .एकलव्य ( ekalavya )  के साथ उनका एक कुत्ता भी रहने लगा. तभी कुछो दिनों के बाद स्वयं गुरु द्रोण अपने शिष्यों के साथ उस स्थान पर आये जहाँ एकलव्य उनकी प्रतिमा के सामने अपने धनु-विद्या का अभ्यास कर रहा था. गुरु द्रोण और उनके शिष्यों को देख वह कुत्ता भोकने लगा जिस कारण एकलव्य ( ekalavya )  की साधना में बाधा आने लगी. उसने अपने बाणों को दूर से ही इस प्रकार चलाया की वे सभी बाण उस कुत्ते के मुंह में इस प्रकार से जा लगे की उसे कोई नुकसान पहुंचे बिना उसका पूरा मुंह उन बाणों से भर गया. जब गुरु द्रोण ने इस अद्भुत धनुर विद्या का प्रदर्शन देखा तो वे एकलव्य ( ekalavya )  पर बहुत प्रसन्न हुए. तभी गुरु द्रोण को अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुधर बनाने की अपनी प्रतिज्ञा के बारे में याद आया.

गुरु द्रोण ने एकलव्य ( ekalavya )  से पूछा की उसने यह धनुर्विद्या किस से सीखी तब एकलव्य ( ekalavya )  ने उन्हें उनकी मिटटी की बनी प्रतिमा की और इशारा किया.

गुरु द्रोण ने कहाँ क्योकि तुमने मेरी प्रतिमा को गुरु मानकर धनु विद्या सीखी है अतः में तुम्हार गुरु हु और तुम्हे मुझे गुरु दक्षिणा देनी होगी इसके बाद गुरु द्रोण ने एकलव्य ( ekalavya )  से दक्षिणा में उसके दाएं हाथ का अंगूठा मांग लिया. एकलव्य ( ekalavya )  ने अपने गुरु के प्रति अपनी पूरी निष्ठा दिखाते हुए उन्हें अपना दाया अंगूठा काटकर दे दिया.

कुमार एकलव्य ( ekalavya )  अंगुष्ठ बलिदान के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला आता है. एकलव्य ( ekalavya )  अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या मेँ पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता है. आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: एकलव्य ( ekalavya )  को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगा.

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