जब स्वयं महायोद्धा कर्ण ने दिया था कुरुक्षेत्र में गुप्त रूप से अर्जुन को जीवनदान, एक अनुसनी कथा !

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Karna Mahabharat:-

महाभारत के युद्ध में कर्ण ( karna ) भले ही अधर्म के पक्ष में खड़े हो परन्तु उनमे माता कुंती और सूर्य देवता का अंश था. कर्ण ( karna ) ने कई जगहों पर अपने नैतिकता का परिचय दिया था. धमनियों में बहने वाला खून दूषित पदार्थ के सेवन से कुछ देर के लिए बुद्धि पर हावी होकर इसे दूसरी ओर फेर देता है परन्तु इससे आत्मा सदैव के लिए दूषित नहीं हो जाती.

आज आप कर्ण के सम्बन्ध में जो कथा सुनने जा रहे इस कथा को पढ़कर आप जानेगें की कौरवों के साथ अधर्म का मार्ग अपनाने के बावजूद कर्ण में नैतिकता जागृत थी.

महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामाह ने यह शर्त रखी थी की जब तक वह कौरवों के प्रधान सेनापति है तब तक कर्ण ( karna ) कौरवों के पक्ष से युद्ध में हिस्सा नहीं ले सकते. भीष्म पितामह की इस शर्त के कारण विवश कर्ण ( karna ) अपने पड़ाव में बैठे युद्ध का समाचार सुनते रहते और छटपटाते रहते थे.

जब अर्जुन के प्रहारों से भीष्म पितामह बाणों के शरशय्या पर पड़ गए तब गुरु द्रोण कौरव सेना के प्रधान सेनापति हुए तथा दुर्योधन के कहने पर गुरु द्रोण ने कर्ण ( karna ) को इस युद्ध में हिस्सा लेने की आज्ञा दे दी. अब कर्ण ( karna ) भी युद्ध में शामिल हो चुके थे और महाभारत का यह युद्ध अपनी चरम सीमा पर था.

भगवान श्री कृष्ण हर समय यह प्रयास करने की कोशिश करते की युद्ध में कहि अर्जुन और कर्ण ( karna ) का एक दूसरे से सामना ना हो जाए. एक बार कुरुक्षेत्र में अर्जुन और कर्ण ( karna ) का एक दूसरे से सामना हो ही गया तथा दोनों एक दूसरे पर तिरो की वर्षा करने लगे. कर्ण ( karna ) अब अर्जुन पर हावी होने लगे थे कर्ण ( karna ) ने अर्जुन पर अनेक तेज बाणों से प्रहार करना शुरू किया. कर्ण ( karna ) का जब एक भयंकर आघात अर्जुन पर आया तो श्री कृष्ण ने अपना रथ नीचे कर दिया.

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