जानिये जिंदगी भर अधर्म के मार्ग पर चलते हुए भी आखिर कैसे दुर्योधन को स्वर्ग की प्राप्ति हुई ?

महाभारत के बारे में कहा जाता है की यह कुरुक्षेत्र के जमीन में लड़ा गया सबसे भीषण युद्ध था जिसमे अनेको योद्धा और सैनिक मारे गए थे. महाभार के भयंकर युद्ध का अनुमान कुरुक्षेत्र के लाल भूमि को देख कर लगाया जा सकता है.

पांडवो और कौरवों के मध्य लड़े गए इस युद्ध का परिणाम क्या हुआ यह तो आप सभी जानते ही है. लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे है की आखिर युद्ध समाप्ति के बाद क्या हुआ जब कौरवों और पांडवो की एक-दूसरे से पहली बार स्वर्ग में मुलाक़ात हुई .

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महाभारत युद्ध समाप्ति के कई वर्षो बाद जब पांडवो को अपने चचेरे भाइयो और रिश्तेदारों की याद सताने लगी तो उन्होंने अपना सारा राज-पाठ अपने उत्तराधिकारी परीक्षित को सोप कर स्वर्ग की यात्रा के लिए प्रस्थान किया . साधुओं के वस्त्र धारण कर पांडवो के साथ स्वर्ग की ओर एक कुत्ता भी उनके साथ बढ़ने लगा.

अनेको तीर्थो, नदियों तथा समुद्रो की यात्रा करते-करते पांडव लाल सागर तक आ गए. लाल सागर पार करते हुए पांडव हिमालय पर्वत होते हुए समरु पर्वत तक पहुंच गए.इसके बाद वे धीरे-धीरे स्वर्ग के मार्ग तक पहुंचे परन्तु स्वर्ग पहुंचने से पूर्व ही मध्य मार्ग में द्रोपदी सहित चार पांडवो की मृत्यु हो जाती है.

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पांडवो में एकमात्र युधिस्ठर ही शेष बचे जो जीवित अवस्था में स्वर्ग पहुंचने वाले थे पर इससे पहले क्योकि युधिस्ठर ने एक बार अपने गुरु दोणाचार्य से असत्य बोला था अतः वह सर्वप्रथम नर्क के मार्ग में पहुंचे जहाँ चारो-तरफ से बदबू ही बदबू आ रही थी चारो और मुर्दे घूम रहे थे तथा उनके ऊपर लोहे की चोंच वाले कौए और गिद्ध मंडरा रहे थे. इसके बाद वे ऐसे मार्ग पर पहुंचे जहाँ हर तरफ सुगंध ही सुगंध थी . अब युधिस्ठर उस कुत्ते के साथ स्वर्ग पहुंच चुके थे जो पुरे मार्ग उनके साथ चलता रहा. युधिस्ठर का स्वर्ग में सबसे पहले दुर्योधन के साथ सामना हुआ उसके बाद वे अपने भाइयो और द्रोपदी से मिले.

दुर्योधन को देखते ही भीम बहुत ही असमंजस में पड़ गए क्योकि जिस दुर्योधन ने ईर्ष्या, द्वेष और लालच की वजह से अपने सगे संबंधियों धोखा दिया, इसके कारण ही अनेको लोगो का रक्त बहा फिर भी आज वह नर्क के स्थान पर स्वर्ग का सुख भोग रहा है.

भीम ने अपने भ्राता युधिस्ठर के समक्ष जाकर यह प्रश्न किया की जो व्यक्ति अपने आजीवन बुरी नियत के साथ कार्य करता रहा, अनीति का ही साथ देता रहा आखिर इस तरह के व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति कैसे हुई. मुझे लगता है यहाँ अवश्य ही ईश्वरीय न्याय में कोई चूक हुई है.

भीम के इस प्रकार का प्रश्न सुन युधिस्ठर मुस्कराए तथा भीम से बोले की ईश्वरीय न्याय में कभी कोई चूक नहीं होती, हमेशा बुरे व्यक्ति को उसके बुराई का परिणाम और अच्छे व्यक्ति को उसके सुकर्मो का परिणाम मिलता है.युधिस्ठर ने अपने भाई भीम को समझाते हुए कहा की हजारो बुराई होने के पश्चात भी दुर्योधन में एक अच्छाई शेष थी और उसी अच्छाई के बल पर दुर्योधन को स्वर्ग की प्राप्ति हुई.

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दुर्योधन के सम्पूर्ण जीवन में उसका सिर्फ एक ही सपष्ट ध्येय था तथा उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए दुर्योधन ने हर सम्भव प्रयास किया. दुर्योधन को उसके बचपन से उचित संस्कार प्राप्त नहीं हो पाया जिस कारण वह सदैव अधर्म के मार्ग पर चलता रहा और सच का साथ नहीं दे पाया.

लेकिन मार्ग में भले ही चाहे कितनी बाधाएं आई हो परन्तु दुर्योधन का सदैव अपने उद्देश्य पर टिके रहना, दृढसंकल्पित रहना ही उसकी अच्छाई बनी . युधिस्ठर ने बताया की अपने उद्देश्य के लिए एकनिष्ठ रहना मनुष्य का सबसे बड़ा सद्गुण है और इसी सद्गुण के कारण दुर्योधन की आत्मा को कुछ देर के लिए स्वर्ग का सुख भोगने का अवसर प्राप्त हुआ है. युधिस्ठर का उत्तर सुनकर भीम की जिज्ञासा खत्म हुई और पांडवो तथा दुर्योधन ने कुछ समय साथ मिलकर बिताया.

भीष्म ने युधिस्ठर को बताई थी चार महत्वपूर्ण बाते, जिनसे अकाल मृत्यु को भी टाला जा सकता है !

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