जब विवश होकर अर्जुन को अपने भ्राता युधिष्ठर के वध के लिए ही उठानी पड़ी तलवार, जानिए महाभारत की एक अनसुनी कथा!

When Arjuna Tried Killing Yudhisthira:

करुक्षेत्र में धर्म और अधर्म के बीच लड़े गए महाभारत के युद्ध की कथा भला कौन नही जनता. ऋषि व्यास के द्वारा रचित महाभारत एक विस्तृत ग्रन्थ है जिसमे अनेको कथाये है जो हम बचपन से सुनते और पढ़ते आये है फिर भी अधिकतर लोग महाभारत की कुछ कथाओ से अनजान है. महभारत के एक प्रसंग के अनुसार धनुधारी अर्जुन को अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिस्ठर पर एक मजबूरी के कारण विवश होकर हत्यार उठाना पड़ा था. आइये जानते है आखिर क्यों अर्जुन को ऐसा करना पड़ा और इसके क्या परिणाम निकले.

पांडवो और कौरवो के मध्य कुरुक्षेत्र में भयंकर युद्ध लड़ा जा रहा था जिसमे अनेको सैनिक पल भर में ही मृत्यु को प्राप्त हो रहे थे. यह युद्ध का 17 वा दिन था तथा गुरु दोर्णाचार्य के बाद कर्ण को कौरवो का सेनापति नियुक्त किया गया था. कर्ण अर्जुन को युद्ध के लिए धुंध रहे थे तभी उनके सामने पांडवो के ज्येष्ठ भ्राता युधिस्ठर आ गए व उन्होंने कर्ण को युद्ध की चुनौती दी. कर्ण के द्वारा युद्ध की चुनौती स्वीकार करते ही दोनों के मध्य भीषण युद्ध शुरू हो गया. धीरे धीरे कर्ण युधिस्ठर पर भारी पड़ने लगे उन्होंने एक के बाद एक उनके समस्त अश्त्रों को बेअसर कर डाला तथा उन्हें बुरी तरह से घायल कर डाला.

जब कर्ण का एक तीर युधिष्ठर के पैर में जा लगा तो वे पीड़ा से कराहते हुए अपने रथ में ही गिर पड़े, अब कर्ण के पास मौका था की वे युधिस्ठर का वध कर पांडवो के नीव को हिला दे. कर्ण ने जैसे ही अपने तरकश से युधिस्ठर को मारने के लिए एक तीर निकला तभी उन्हें ध्यान आया की उन्होंने तो माता कुंती को उनके पांचो पुत्रो में से सिर्फ एक पुत्र का वध करने का वचन दे रखा है और वह उसी समय रुक गए. क्योकि वे अर्जुन से प्रतिशोध रखते थे और उनका वध करना चाहते थे, इस तरह युधिस्ठर का वध कर वह अर्जुन को मारने का अवसर को नही खोना चाहते थे. कर्ण युधिस्ठर को उसी हालत में छोड़ अर्जुन को ढूढ़ता हुए आगे बढ़ गए.

अनुज नकुल और सहदेव ने जब युधिस्ठर को घायल अवस्था में पाया तो वे युधिस्ठर को पांडवो के शिविर में उपचार के लिए ले गए जहा सहदेव ने युधिस्ठर के चोट वाले स्थान पर ओषधि लगाई. जब अर्जुन युद्ध में कौरवो की सेना का संहार कर रहे थे तभी भीम अर्जुन के पास आये तथा भ्राता युधिस्ठर के बारे में बतलाया. अपने भ्राता की दुर्दशा के बारे में सुन अर्जुन को क्रोध आ गया और जैसे ही वे कर्ण को ढूढ़ने के लिए बढ़े भीम ने अर्जुन को रोका व शिविर में जाकर युधिस्ठर की सुरक्षा का जिम्मा सोपा. जब युधिस्ठर ने अर्जुन को शिविर की ओर आता देखा तो वे ये सोचकर प्रसन्न होने लगे की अर्जुन ने उनकी ऐसी अवस्था करने वाले कर्ण का वध कर दिया. जैसे है अर्जुन ने शिवर के अंदर कदम रखा तो युधिस्ठर बोल उठे मेरे भाई मुझे तुम पर गर्व है मुझे पता था की तुम मेरी ऐसी दशा करने वाले कर्ण का वध कर दोंगे.

When Arjuna Tried Killing Yudhisthira:

परन्तु जब युधिस्ठर को सत्य का ज्ञात हुआ तो वे क्रोधित हो गए तथा क्रोध में उन्होंने अर्जुन के अश्त्र गांडीव के बारे में अपशब्द कह दिए. अर्जुन ने यह शपथ ली थी की कोई भी व्यक्ति चाहे वह अपना हो या परया यदि उनके प्रिय गांडीव के प्रति अपशब्द कहता है तो वह उसका सर काट देंगे. अतः ना चाहते हुए भी वह अपनी तलवार उठाकर अपने भ्राता की ओर बढ़े तभी उसी समय श्री कृष्ण ने आकर अर्जुन को भ्राता हत्या के पाप का भय बतलाकर रोका.

श्री कृष्ण ने कहा यदि तुम अपने वचन को पूरा करना चाहते हो तो अपने भ्राता का अपमान करो, अपने बड़ो का अपमान करना उनके लिए मृत्यु के समान ही होता है. अर्जुन ने अपने भ्राता युधिष्ठर का अपमान किया परन्तु अब उन्हें आत्मगिलानी होने लगी अतः उन्होंने आत्महत्या के लिए तलवार उठाई. परन्तु श्री कृष्ण उन्हें ऐसा करने से रोकते हुए बोले की शास्त्रो में आत्महत्या करना एक बहुत बड़ा अधर्म है अतः यदि तुम अपनी आत्महत्या ही करना चाहते हो तो सब के सामने अपनी प्रसंसा करो, स्वयं की द्वारा सबके समक्ष अपनी प्रसंसा करना आत्महत्या के समान ही माना जाता है.

श्री कृष्ण के कहे अनुसार अर्जुन अपने भाइयो और श्री कृष्ण के सामने अपनी प्रसंसा करने लगे तथा इस तरह वे अपने वचनो को पूरा करते हुए अधर्म करने से भी बच गए.

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