जानिए महादेव शिव के अनन्य भक्त कहलाने वाले नागा साधुओ का रहस्य !

हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक में लगने वाले कुम्भ, अर्धकुम्भ या सिंहस्थ कुम्भ के मेला देखने लायक होता है क्योकि यहाँ लाखो की आबादी में देश-विदेश से लोग आते है विशेषकर सभी प्रकार के साधुओ का जमावड़ा सा यहाँ लगा रहता है. इन महाकुम्भो में गंगा की पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हुए नागा बाबा भी बड़ी आसानी से देखे जा सकते है परन्तु जब इस महाकुम्भ का समापन होता तो अचानक ये सभी नागा साधु गायब हो जाते है तथा आखिर कैसे बनते है ये नागा साधु. आइये आज हम होते है नागा साधुओ के इन रहस्मयी बातो से परिचित.

भारत में नागा साधुओ का इतिहास बहुत पुराना है फिर भी समान्यजनो के लिए नागा साधु एक पहेली बने हुए है. आखिर ये कहा रहते है, क्या है इनके जीवन के अर्थ? इन्हे देखकर अक्सर इस तरह के प्रश्न हमारे मन में उठ खड़े होते है. नागा शब्द की उत्पति के विषय में कुछ विद्वानो का कहना है की ये शब्द संस्कृत के नागा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है ”पहाड़ी”. कच्छारी भाषा में नागा का तातपर्य बहादुर एवं लड़ाकू व्यक्तियों से लिया जाता था.

भारतीय सनातन धर्म में नागा साधुओ की नीव आदि गुरु शंकराचर्य ने रखी थी . पहले भारत सबसे धनी देशो में से एक था उस धन से आकर्षित होकर बहार के देशो से लोग यहाँ आने लगे. बहार से आये इन लोगो में कुछ लोग भारत का धन लूटकर बहार अपने देश ले गए तथा कुछ यहाँ की धन सम्पदा से आकर्षित होकर यही बस गए. ईश्वर, धर्म, शास्त्रो और तर्कशास्त्रो आदि को भारी चुनोतियो का सामना करना पड रहा था इस स्थिति को देखते हुए गुरु शंकराचार्य ने कुछ ठोस कदम उठाए जिनमे से एक था चार पीठो की स्थापना करना. इन चार पीठो के नाम थे ज्योतिर्मठ पीठ, गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ व द्वारिका पीठ . इसके बाद गुरु आद्य शंकराचार्य ने मंदिर एवं मठो के सम्पदा तथा श्रधालुओ को मुसीबतो से बचाने के लिए अनेको जगहों पर अखाड़े का निर्माण करवाया. इन अखाड़ों में तैयार किये गए लड़ाकू साधु नागा कहलाये. ये साधु राजा महाराजाओ की भी विदेशियो के विरुद्ध आक्रमण करने में मदद किया करते थे.

नागा साधु का जीवन एक आम व्यक्ति से बहुत ही भिन्न होता है तथा नागा बनने के लिए भी बहुत कठिन परीक्षा से गुजरना होता है.हर किसी के लिए नागा बनना सम्भव नही क्योकि इसके लिए दृढ इच्छाशक्ति और सन्यासी बनने की प्रबल इच्छा का होना आवश्यक है. भारत में 13 ऐसे अखाड़े है जहा साधुओ को नागा बनाया जाता है परन्तु इन सब में जूना ऐसा अखाडा है जहा सबसे ज्यादा साधु नागा बनाये जाते है. नागा बनने का इच्छुक साधु जिस अखाड़े में नागा बनने जाते है वहा का प्रबंधक पहले इस बात की पुष्टि करता है की आखिर वह नागा क्यों बनना चाहता है उस साधु के पूरी पृष्ठ भूमि जानने के बाद उसे अखाड़े में शामिल किया जाता है. आखाड़े में शमिल होने के बाद उसे 3 सालो तक अपने गुरु की सेवा करते हुए अखाड़े के सभी कर्म कांडो आदि से परिचित होना पड़ता है. जब नागा बनने की इच्छा रखने वाले साधु पर उसके गुरु को पूर्ण विस्वास हो जाता है तब उसके साधु से महापुरुष बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है. उसके पांच गुरु निर्धारित करने के बाद महाकुम्भ में उससे 108 बार गंगा में डुबकी लगवाई जाती है तथा उसे भष्म, भगवा, रुद्राक्ष आदि शरीर में धारण के लिए दिए जाते है. महापुरुष बन जाने के बाद उसकी अवधूत बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है.

इस प्रक्रिया में साधु से महपुरुष बने व्यक्ति को जनेऊ संस्कार करवाया जाता है तथा उसके परिवार द्वारा ही उसका पिंडदान होता है . इसके बाद रात भर उससे ओम नमः शिवाय का जाप करवाया जाता है तथा अगली सुबह 108 बार गंगा नदी में डुबकी लगाई जाती है व अखाड़े के नीचे दंडी त्याग करवाया जाता है . इस प्रकार साधु से नागा बनने की प्रक्रिया समाप्त होती है. नागा साधु बनने के बाद वह अपने पुरे शरीर को भस्म से मल लेता है ये भस्म मुर्दे की राख को शुद्ध करके लगाया जाता है या हवन कुण्ड की राख को शरीर में रगड़ा जाता है.त्रिशूल शंख तथा धुनि रमाने वाले ये नागा साधु शेव पंत के कटटर होते है तथा अपने नियम के बहुत ही पक्के और कठोर होते है . इनमे से कई सिद्ध होते है तो कई औघड़. .

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