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एक बार नारद मुनि को यह अहंकार हो गया था की भगवान विष्णु का उनसे बड़ा भक्त तीनोलोक में कोई नही. अपने इसी अहंकार की मस्ती में वह एक दिन पृथ्वीलोक पहुंचे परन्तु वहा पहुंच उन्हें आश्चर्य हुआ की हर कोई व्यक्ति भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के नाम के साथ राधे का नाम ले रहा था. हर जगह राधा की स्तुति श्री कृष्ण के नाम के साथ सुन वे खीझ गए तथा सोचने लगे भगवान विष्णु को सबसे ज्यादा प्रेम तो मैं करता हूँ, दिन रात उनके नाम का जाप करते रहता हु, इसके बावजूद उनके नाम के साथ मेरा नाम जोड़ने की बजाए आखिर राधा नाम क्यों जोड़ा जा रहा है.

अपनी इस समस्या को लेकर नारद मुनि भगवान श्री कृष्ण के पास गए. परन्तु जब वे श्री कृष्ण के पास पहुंचे तो उन्होंने पाया की वे तो अस्वस्थ है तथा सर की पीड़ा से कराह रहे है. उन्हें इस हाल में देख नारद का हृदय द्रवित हो उठा तथा उन्होंने श्री कृष्ण से पूछा की है भगवान मुझे तुरंत बताइये की किस प्रकार में आपकी इस पीड़ा का अंत कर सकता हूँ. यदि इसके लिए मुझे अपने शरीर का दान भी करना पड़े तो मैं इसमें जरा भी देरी नही करूंगा. भगवान श्री कृष्ण बोले नारद जी आपको मेरे इस पीड़ा के लिए अपने शरीर के दान करने की आवश्यकता नही मुझे तो यदि कोई मेरा भक्त अपने चरणो का धुला हुआ पानी पिला दे तो मैं इस पीड़ा से मुक्ति पाउ.

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नारद ने मन में विचार किया की स्वयं पुरे जगत के पालक को यदि मैं अपने पेरो का धुला जल दूंगा तो मुझे घोर नरक की प्राप्ति होगी मैं इतने बड़े पाप को अपने ऊपर नही ले सकता तथा उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को अपनी असमर्थता जताई. भगवान श्री कृष्ण नारद जी से बोले यदि आप यह कार्य नही कर सकते तो कृपया रुक्मणी को जाकर सारी बात बताये.

सम्भवतः वे मेरी इस पीड़ा को दूर करने में मदद कर दे. कृष्ण की आज्ञा से नारद रुक्मणी के पास गए और उन्हें सारा वृतांत बताया परन्तु रुक्मणी ने भी यह पाप करने से मना कर दिया. नारद मुनि श्री कृष्ण के पास गए और उन्हें पूरी बात बताई तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें राधा से मदद लाने को कहा.

राधा के पास जाकर जैसे ही नारद ने उन्हें कृष्ण का हाल सुनाया, राधा ने बगैर सोचे-विचारे एक जल से भरा पात्र लिया तथा उसमे अपने दोनो पेरो को धोया. राधा ने अपने पेरो से धुले हुए उस जल को नारद को पकड़ाते हुए बोली की मैं जानती हूँ की मेरे इस कार्य द्वारा मुझे रौरव नामक नरक तथा उसी के समान अनेक नरको की प्राप्ति होगी परन्तु मैं अपने प्रियतम को होने वाली पीड़ा को बिलकुल भी सहन नही कर सकती, उन्हें पीड़ा से मुक्त करने के लिए मैं अनेको नरक की यातना झेलने को तैयार हूँ. अब नारद को ज्ञात हो चूका था की क्यों पृथ्वीलोक में सभी राधा के प्रेम का स्तुतिगान गा रहे थे. नारद ने स्वयं भी वीणा पकड़ी और राधा के नाम का धुन गाने लगे !

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