भगवान श्री कृष्ण की एक अनोखी लीला, दो मुद्राओ से दिखाया चमत्कार !

Shri krishna leela:

एक बार जब भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण के पश्चात हस्तिनापुर वापस लोट रहे थे तो उन्हें रास्ते में बहुत ही दयनीय अवस्था में एक गरीब ब्राह्मण दिखाई दिया. उसने अर्जुन से भिक्षा देने को कहा, अर्जुन को उस ब्राह्मण की अवस्था पर दया आ गयी तथा उन्होंने उसे एक स्वर्ण मुद्राओ से भरी थेली दे दी. उस थेली को पाकर ब्राह्मण अति प्रसन्न हो गया तथा अपने सुखो के बारे में सोचते हुए तेजी से घर की और जाने लगा परन्तु दुर्भाग्यवश मार्ग में एक लुटेरा ब्राह्मण के सामने आ गया तथा उसने डरा-धमकाकर ब्राह्मण से स्वर्ण मुद्रा से भरी थेली छीन ली.

ब्राह्मण अत्यंत दुखी हुआ तथा उसे फिर से लोगो से भिक्षा मागने के लिए विवश होना पड़ा. एक दिन जब वह भिक्षा मांग रहा था तो अर्जुन के नजर उस ब्राह्मण पर पड़ी तथा अर्जुन ने आश्चर्य करते हुए उस ब्राह्मण से पूछा की मेने तो आप को प्रयाप्त मात्र में धन दिया था परन्तु फिर भी आप भिक्षा क्यों मांग रहे हो ? ब्राह्मण ने अर्जुन को बताया की किस तरह वह एक लुटेरा द्वारा मार्ग में लूट लिया गया जिस पर अर्जुन ने फिर से उस ब्राह्मण पर दया दिखाते हुए उसे एक बहुत ही मूलयवान हीरा दिया. ब्राह्मण ने अर्जुन का धन्यवाद करते हुए वह हीरा लिया तथा एक सुरक्षित मार्ग से अपने घर पहुंच गया.

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ब्राह्मण ने चोर आदि के भय से उस हीरे को एक पुराने घड़े में छिपा दिया उस घड़े का प्रयोग उनके द्वारा बहुत दिनों से नही हुआ था. थकान के कारण ब्राह्मण की आँख लग गई और वह गहरी नींद में सो गया. परन्तु यह उस ब्राह्मण का दुर्भाग्य था की उसकी स्त्री जब पानी भरने नदी में गयी तो उसका घड़ा मार्ग में टूट गया जिस कारण उसने पानी भरने के लिए वह घड़ा लिया जिसमे ब्राह्मण ने वह मूलयवान हीरा छुपा कर रखा था. जब ब्राह्मण की स्त्री नदी से पानी भर रही थी तो वह हीरा पानी में डूब नदी के साथ बह गया.

ब्राह्मण ने जब उस घड़े को जल से भरा देखा तो वह समझ गया की क्या हुआ होगा तथा फिर से वह अपने भाग्य को कोसते हुए भीख मागने निकल गया. जब उस ब्राह्मण को श्री कृष्ण और अर्जुन ने पुनः भीख मांगते देखा तो वे उन्होंने उनसे उस कारण पूछा. ब्राह्मण ने जब पूरा वृतांत सुनाया तो अर्जुन श्री कृष्ण से बोले की इस ब्राह्मण के भाग्य में तो सुख लिखा ही नही है फिर कोई इसके समक्ष दुनिया का समस्त धन लाके ही क्यों न रख दे. तब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को देख मुस्कराये और अपनी लीला चलते हुए उस ब्राह्मण को दो पैसे दान में दिए. अर्जुन आश्चर्य होते हुए भगवान श्री कृष्ण से बोले जब मेरे द्वार दिए स्वर्ण की मुद्राओ और मूलयवान हीरे से भी यह व्यक्ति अपने दुर्भाग्य के कारण दरिद्र ही रहा तो आपके ये दो पैसे इसकी मदद कैसे कर सकते है. भगवान कृष्ण फिर से मुस्कराये और बगैर कुछ कहे अर्जुन को उसके पीछे जाने का इशारा किया.

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ब्राह्मण दुखी मन से यह सोच रहा था की आखिर श्री कृष्ण ने उसे ऐसा तुच्छ दान क्यों दिया क्योकि इन रूपये से वह अपने खुद के लिए एक समय का भोजन प्राप्त नही कर सकता. तभी उसे एक मछुवारा दिखाई दिया जिसके जाल में एक मछली अब भी जिन्दा थी और तडप रही थी. ब्राह्मण ने सोचा मेरे पास जो पैसे है उस से मेरा तो भला हो नही सकता क्यों न इस मछली की ही जान बचा ली जाये. उस ब्राह्मण ने दो पैसे में वह मछली खरीद ली और उसे अपने कमंडल में डाल पास ही नदी की और बढ़ने लगा. तभी उसने देखा की उस मछली के मुह से एक चमकीला पदार्थ निकला, वह वही हीरा था जो उसे अर्जुन से प्राप्त हुआ था. ब्राह्मण खुसी में चिलाने लगा मिल गया, मिल गया. ब्राह्मण के भाग्य से वह लुटेरा जिस ने ब्राह्मण को लूटा था उसी नदी के किनारे से होते हुए निकल रहा था. जब उसने ब्राह्मण को मिल गया चिलाते हुए सुना तो उसे लगा की ब्राह्मण को पता चला गया की उसी ने ब्राह्मण को लूटा था. ब्राह्मण राजदरबार में उसकी शिकायत न कर दे इस डर से उस लुटेर ने ब्राह्मण को उसका धन लौटाते हुए उसके चरणो में गिर माफ़ी मागने लगा.

इस सब को देख अर्जुन भगवान कृष्ण को हाथ जोड़ते हुए बोले भगवान यह आपकी कैसी लीला है, मेरे द्वारा ब्राह्मण को दिए गए मूलयवान हीरे और स्वर्ण मुद्राओ के कारण भी ब्राह्मण पहले की भाती अपने दरिद्र अवस्था में बना रहा परन्तु आपके द्वारा दिए दो पैसो ने उसका भाग्य ही बदल डाला .

श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा की अर्जुन यह चमत्कार तो सिर्फ सोच के अंतर के कारण हुआ. जब उस ब्राह्मण ने स्वर्ण मुद्राए और मूलयवान हीरा प्राप्त किया तो वह सिर्फ अपने सुखो के बारे में सोच रहा था परतु जब उसके मात्र दो पैसे थे तो उसने अपना दुःख भुलाते हुए दूसरे के सुख के बारे में सोचा. अतः जो व्यक्ति दुसरो की भलाई के बारे में सोचता है उसके साथ सदेव में होता हु तथा उसका भला स्वतः ही होता है.

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