जानिए भगवान विष्णु के परम भक्त की कथा, नन्द से कैसे बने देवऋषि नारद !

प्रभास क्षेत्र में ऋषियों का एक आश्रम था जहा नन्द नामक एक दासी पुत्र उन ऋषियों की सेवा किया करते थे. आश्रम में निवास करने वाले समस्त ऋषि नन्द के सेवाभाव एवं निष्ठां से प्रसन्न थे तथा नन्द को अपने पुत्र के ही समान मानते थे. नन्द भी उनके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए सदेव तत्तपर रहते थे. धीरे धीरे नन्द का आश्रम में रहते हुए वैदिक वातावरण और उनकी सेवा भाव से समस्त पाप नष्ट होने लगा. उसका चित शुद्ध और पवित्र हो गया तथा वह अब भगवान की लीलाओ के गुणगान में व्यस्त रहने लगा.

कुछ समय बाद ऋषियों ने आश्रम छोड़ नए स्थान पर जाने का निश्चय किया. जब नन्द को इस बात का पता लगा तो वे ऋषिगण के पास गए तथा उनसे बोले हे ऋषिगणों ! मेने अनेक वर्षो तक आपकी सेवा करी है, दिन रात आपके निकट रहने के कारण मेरा मन सांसारिक बंधनो से विरकत हो गया है आपके बिना रहने की में कल्पना भी नही कर सकता अतः आप मुझे अपने साथ ले चले. उसकी प्रेम भरी विनती सुन ऋषि बोले हम भी तुम से पृथक नही होना चाहते परन्तु इस संसार में तुम अकेले नही हो. तुम अपनी माता का एकमात्र सहारा हो सन्यास ग्रहण करने के लिए तुम उन्हें त्याग नही सकते. अतः तुम अपनी माता की सेवा करते हुए यही प्रभु भक्ति में ध्यान लगाओ.

एक दिन वन में सुखी लकड़ी बीनते समय नन्द की माता को एक साँप ने डस लिया. साँप के डसे जाने पर वह काल का ग्रास बन गई अब नन्द बिलकुल अकेला हो चूका था. नन्द एक उच्चे पर्वत पर गया तथा उसने भगवान विष्णु के चरणो में ध्यान लगाना शुरू किया उन्हें ऐसा करते हुए अनेक वर्ष बीत गए. अंततः भगवान विष्णु साक्षात नन्द के सामने प्रकट हुए तथा उनसे वरदान मागने के लिए कहा. नन्द भगवान विष्णु से बोले में आपके दुर्लभ दर्शन पाकर कृतार्थ हो गया व मेरे मन में कोई संसारिक इच्छा शेष नही रह गयी है. में इसी तरह आपका ध्यान करते हुए आपके रूप को प्राप्त करना चाहता हु.

भगवान विष्णु बोले” मैं तुम्हारी निस्वार्थ सेवा भक्ति से बहुत प्रसन्न हुआ हु, तुम जैसा कोई भक्त आज तक न हुआ है न होगा. अतः में तुम्हे वरदान देता हूँ की तुम अगले जन्म में तीनो लोको में मेरे परम भक्त के रूप में प्रसिद्ध होगे. मेरे प्रति तुम्हारी निस्वार्थ भक्ति तुम्हे सदा के लिए अमर कर देगी, यह कहते हुई भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए. तत्पश्चात नन्द ने ब्रह्चर्य व्रत का संकल्प लिया तथा भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करते हुए पृथ्वी में भर्मण करने लगे.समय व्यतीत होता रहा और कुछ वर्षो बाद नन्द ने श्री हरी के चरणो में अपने प्राण त्याग दिए. अगले जन्म में देवऋषि नारद ब्रह्मा जी के मानश-पुत्र के रूप में जन्मे तथा तीनो लोको में देवऋषि नारद के रूप में प्रसिद्ध हुए. अपने इस जन्म में भी देवऋषि नारद ने ब्रह्मचर्य का संकल्प धारण करते हुए भगवान विष्णु की महिमा में अपना ध्यान लगाया !

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जब भगवान विष्णु को होना पड़ा शीशविहीन तथा प्राप्त हुआ अश्व का सर !

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