जानिए महाशिवरात्रि का महत्व तथा कैसे करे इस दिन भगवान शिव को प्रसन्न !

Importance of mahashivratri

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Importance of mahashivratri:

महाशिवरात्रि हिन्दुओ का एक महत्वपूर्ण पर्व कहलाता है यह भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन माना जाता है. इस दिन किये जाने वाले शिव के व्रत का महत्व  अन्य व्रतो से अधिक है तथा भगवान शिव के भक्तो द्वारा इस अवसर पर घर या मंदिर  में शिवलिंग पर जल एवं दूध चढ़ा कर उनकी पूजा द्वार उन्हें प्रसन्न किया जाता है. शिव रात्रि के दिन सभी मंदिर घंटियों की आवाज से गुज उठते है तथा हर तरफ ओम नमः शिवाय  की ध्वनि सुनाई देती है. फाल्गुन के कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि का यह पावन पर्व मनाया जाता है तथा ऐसा कहा जाता की इस दिन भगवान शिव रूद्र रूप में ब्रह्मा और विष्णु के सामने प्रकट हुए थे जिसका वर्णन शिवपुराण में वर्णित है. भगवान शंकर इस दिन महाकालेश्वर  के रूप में अवतरित हुए थे, भगवान शिव इस रूप में तांडव नृत्य द्वारा सृष्टि का अंत करते है. भगवान शिव का यह रूप शिवरात्रि में मध्यरात्रि को हुआ था अतः शिवरात्रि की मध्यरात्रि, कालरात्रि के नाम से भी जानी जाती है. महाशिवरात्रि के दिन को भगवान शिव और माता पार्वती  के विवाह का दिन भी माना जाता है.

शिवपुराण के अनुसार ऐसे उत्तपन हुए भगवान शिव :- एक बार ब्रह्मा और विष्णु  में इस बात को लेकर झगड़ा होने लगा की दोनों में कौन श्रेष्ठ है, ब्रह्मा बोले मेने समस्त सृष्टि का निर्माण किया है अतः में तुम से श्रेष्ठ हु जिसका विरोध करते हुए विष्णु बोले में सम्पूर्ण सृष्टि का पालनकर्ता हु अतः में श्रेष्ठ हु. तभी उन दोनों के समक्ष एक तेजप्रकाश के रूप में तेजपुंज  प्रकट हुआ तथा वह धीरे-धीरे बढ़ने लगा. ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने अपने आपको एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखाने के लिए एक प्रतियोगिता रखी, वह यह थी की जो भी उस तेज पुंज के अंतिम छोर का पहले पता लगाएगा वह सर्वश्रेष्ठ होगा. परन्तु दोनों ही इस प्रयास में असफल रहे तथा निराशा से उस तेजपुंज की और देखने लगे. तभी उस तेजपुंज ने अपना आकर समेट लिया तथा अपना परिचय देते हुए बोला की में शिव  हु, मेरे द्वारा ही तुम्हारी उत्तपति हुई है. तब भगवान शिव ने उस तेजपुंज से निकल कर अपने रूप का ब्रह्मा और विष्णु जी को दर्शन कराया तथा उनकी महत्ता जान ब्रह्मा और विष्णु हाथ जोड़ उनकी आराधना करने लगे.

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शिवरात्रि की पूजा की विधि :- शिवरात्रि के दिन प्रातः जल्दी उठकर व स्नान के बाद व्रती को भगवान शिव का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा इसके पश्चात समीप के मंदिर में जाकर शिवलिंग को ताम्बे या मिटटी के बर्तन में पानी व दूध भर स्नान कराना चाहिए. इस दिन भगवान शिव पर बेलपत्री, दही, घी, पुष्प, फल  आदि अर्पित कर निम्न मंत्रो का उच्चारण करना चाहिए.

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते.
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव..
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति.
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि..

व्रती को शिवरात्रि पर सारे दिन निराहार रहते हुए भगवान शिव की कथा सुननी चाहिए तथा रात्रि को वह पूजा आदि के बाद फलाहार ले सकता है. शिवरात्रि की रात भगवान शिव का जाप करते हुए जागरण करना चाहिए. अगले सुबह तिल, जो, खीर, बेलपत्री आदि का हवन कर व्रती को अपना उपवास तोडना चाहिए.

महाशिवरात्रि का व्रत उत्तम फल देने वाला होता है  तथा यह व्रत धारण करने वाले व्यक्ति की समस्त मनोकामनाओ को पूर्ण करता है. शिवरात्रि के दिन सच्चे मन से की गयी पूजा से भगवान शिव प्रसन्न होते है तथा उस पर अपनी कृपा करते है. शिवरात्रि के व्रत द्वारा प्राप्त पुण्य से व्यक्ति के घर में सुख समृद्धि  बनी रहती है तथा उसे किसी प्रकार का कोई कष्ट नही सताता. इस व्रत का फल मोक्ष प्राप्त करने वाला माना जाता है !

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