जानिए सर्वशक्तिमान गायत्री मन्त्र और इसकी महत्ता के बारे में !

importance of gayatri mantra

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importance of gayatri mantra:

शास्त्रो में गायत्री मन्त्र की शक्तियों को ओम मन्त्र के समान ही माना गया है तथा इस महान मंत्र की उतपत्ति ब्रह्मा जी ने सृष्टि के निर्माण से पूर्व करी थी. परन्तु कुछ विद्वान कहते है की ब्रह्माण्ड के निर्माण से पहले जब सब कुछ शून्य था तो उस समय केवल गायत्री मन्त्र ही आस्तित्व में था तथा जिसकी शक्ति से एक भयंकर विस्फोट हुआ व ब्रह्मा, विष्णु, महेश  तीनो ब्रह्म शक्तियों की उतपत्ति हुई. यह मन्त्र यजुर्वेद तथा ऋग्वेद  के छंद से मिलकर बना है, गायत्री मन्त्र को समस्त वेदो की जननी माना जाता है अतः इसे वेद माता के नाम से भी जाना जाता है.

हिन्दू धर्म में गायत्री मन्त्र को माता के नाम से सम्बोधित किया गया है तथा इसे ही सनातन धर्म  की जननी भी कहा जाता है. शास्त्रो के अनुसार माँ गायत्री का अवतरण ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी  को हुआ था. भगवान मनु ने इस मन्त्र की महिमा बताते हुए कहा है की यदि कोई व्यक्ति सिर्फ तीन वर्ष तक इस मन्त्र का जाप करता है तो वह आकश की तरह व्यापक परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है. धर्म शास्त्रो में माँ गायत्री को पंचमुखी बताया गया है अर्थात ब्रह्माण्ड के पांचो तत्व आकाश, जल, वायु, अग्नि तथा पृथ्वी पांचो शक्तिया माँ गायत्री में समाहित है. इस पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी भी इन पांच तत्वों से मिलकर बना है तथा माँ गायत्री प्रत्येक प्राणी में प्राण शक्ति के रूप में विराजमान है.

महभारत के शांति  पर्व के 119 वे अध्याय में माँ गयत्री की महिमा का वर्णन किया गया है इस कथा के अनुसार कौशिक गोत्र में उतपन्न महान ऋषि पिप्लाद के पुत्र एक दिन माँ गायत्री के मन्त्र का जप करने बैठे. उन्हें बिना रुके लगातार एक हजार वर्ष तक गायत्री मन्त्र  का जप किया जिस से माँ गायत्री प्रसन्न होकर उनके समक्ष प्रकट हुई. परन्तु वे गायत्री मन्त्र के जाप में इतने लीन थे की उन्हें पता ही नही चला की माँ गायत्री कब से उनके सामने खड़ी है. माँ गायत्री उनकी जप निष्ठा से प्रसन्न हुई तथा उनकी जप निष्ठा की प्रसंसा करते हुए वही खड़ी रही. अचानक जप करते हुए ब्राह्मण ने माँ गायत्री को अपने समीप पाया तो वह उनकी चरणो में जा गिरा. माँ गायत्री ने उनसे वरदान मागने को कहा तो ब्राह्मण बोले की मुझे किसी भी प्रकार के वरदान की इच्छा नही फिर भी यदि आप मुझे वरदान ही देना चाहती है तो मुझे यह वरदान दे की मेरी मन्त्र जाप करने की इच्छा कभी ना खत्म हो. माँ गायत्री ब्राह्मण को वरदान  देकर अंतर्ध्यान हो गई तथा ब्राह्मण पुनः देवताओ के 100 वर्षो तक जप करता रहा. जब सृष्टि के तीनो चरण समाप्त हो गए तथा नया चरण आरम्भ हुआ तो स्वयं धर्म देव ने प्रकट होकर ब्राह्मण से स्वर्गलोक  मागने को कहा परन्तु ब्राह्मण बोले की मुझे किसी भी प्रकार का लोभ नही है में तो सिर्फ गायत्री मन्त्र के जप से आनंदित हु. इस प्रकार मृत्यु देव व अन्य देव भी उनके समक्ष प्रकट होकर उनके जप की प्रसंसा करने लगे.

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एक बार इक्ष्वाकु नाम का राजा तीर्थ यात्रा पर निकला तथा मार्ग में उसकी भेट गायत्री मन्त्र का जप  करते हुए ब्राह्मण से हुई. ब्राह्मण के गायत्री जप को देख वे प्रसन्न हुए तथा उनसे स्वर्ण एवं धन मागने को कहा. ब्राह्मण ने कुछ ना मांगते हुए राजा से कहा यदि आप को कुछ चाहिए तो में अपने सिद्ध शक्तियों द्वारा दे सकता हु. राजा ने व्यंग कसते हुए कहा अगर आप मुझे कुछ देना चाहते हो तो अपने समस्त जप का फल मुझे दे दीजिये. ब्राह्मण उसे अपने तप का फल देने के लिए तुरंत तैयार हो गए परन्तु अब राजा उसे लेने में हिचकिचाने लगे. क्योकि राजा क्षत्रिय था अतः वह किसी से कुछ लेने में अपने धर्म की हानि मानता था वही ब्राह्मण उसे अपने तप के समस्त फल देने के हठ में थे. दोनों में विवाद हो गया तथा तभी त्रिदेव उनके समक्ष प्रकट हो गए. विष्णु बोले की जो फल तप से प्राप्त होता है वही फल गायत्री मन्त्र के जप के प्रभाव से भी प्राप्त होता है.त्रिदेवो के आशीर्वाद से ब्राह्मण और राजा दोनों एक तेजप्रकाशीय शक्ति में बदल गए तथा दोनों ब्रह्म को प्राप्त हुए.

गायत्री मन्त्र :-
ॐ भूर्भुव स्वः . तत् सवितुर्वरेण्यं . भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.
हिंदी अर्थ:-
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें. वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे !

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