आमलकी एकादशी का महत्व और विधि !

शास्त्रो के अनुसार फाल्गुन माह को पड़ने वाली शुक्ल एकादशी का बहुत अत्यधिक महत्व है. यह एकादशी रंगभरनी एकादशी और आमलकी एकादशी के नाम से भी जानी जाती है.इस एकादशी के महत्वपूर्ण होने के तीन कारण है जिनमे पहला कारण यह है की इसी दिन महादेव शिव माता पार्वती से विवाह रचाने के पश्चात पहली बार अपने प्रिय नगरी काशी पधारे थे. दूसरा कारण है की इसी दिन भगवान विष्णु ने सृष्टि के निर्माण हेतु ब्रह्मा जी और आवले के वृक्ष का निर्माण किया था. तीसरा कारण यह है की इसी दिन श्याम बाबा का मष्तक श्याम कुण्ड में प्रकट हुआ था.
यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के प्रथम बार कशी में पधारने के प्रतीक के रूप मनाया जाता है. इस दिन कशी में भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति विश्वनाथ मंदिर में लायी जाती है तथा लोग एक दूसरे पर अबीर और गुलाल लगाते है. इस दिन से होली की शुरुवात हो जाने के कारण ही इस एकादशी को रंगभरनी एकादशी कहा जाता है.

इस एकादशी का नाम आमलकी पड़ने का कारण यह है की इस दिन भगवान विष्णु ने सृष्टि को जन्म देने हेतु ब्रह्मा को उतपन्न किया था जिसके साथ ही उन्होंने आवले का वृक्ष भी उतपन्न किया. शास्त्रो में श्रेष्ठ बतलाया गया आवले का वृक्ष आदि वृक्ष में प्रतिष्ठ होकर भगवान विष्णु का ही अंग माना जाने लगा. आमलकी एकादशी का व्रत बहुत ही पुण्यदायी है.

आइये आगे जानते है क्या करे इस दिन….

इस एकादशी की दिन व्रती को प्रातः जल्दी उठ भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए इसके बाद स्नान आदि कर घर के पूजास्थल में जाकर भगवान विष्णु के प्रतिमा के समक्ष तिल, कुश, मुद्रा और जल आदि चढ़ा कर यह संकल्प करना चाहिए की में मोक्ष की कामना की प्राप्ति से यह व्रत रखता हु. तत्पश्चात ”मम कायिकवाचिकमानसिक सांसर्गिकपातकोपपातकदुरित क्षयपूर्वक श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फल प्राप्तयै श्री परमेश्वरप्रीति कामनायै आमलकी एकादशी व्रतमहं करिष्ये” इस मंत्र से संकल्प लेने के पश्चात आवले के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए.

आवले के वृक्ष की पूजा करने से पूर्व वृक्ष के नीचे के स्थान को साफ कर गोबर से लिपे इसके बाद वहा कलश स्थापित कर कलश के अंदर पंच रत्न स्थपित करे. अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुरामजी की पूजा करें. रात्रि में भगवत कथा व भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें. द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन करवा कर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें. इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें. इस एकादशी के व्रत के फलस्वरूप व्यक्ति अपने सभी पापो से मुक्ति प्राप्त कर मोक्ष को पा जाता है !

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