एक असुर के कारण निर्मित हुआ ऐसा पवित्र तीर्थ स्थल जहा पितरो का श्राद करने से होती है उन्हें मोक्ष की प्राप्ति !

gaya moksha dham

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Gaya moksha dham:

ब्रह्मा जी जब सृष्टि की रचना का कार्य कर रहे थे तो उसी दौरान उनसे असुर कुल में एक गय नामक असुर की रचना हो गई. गय ब्रह्मा जी के द्वारा निर्मित हुआ था इसलिए उसमे अन्य असुरो के संतानो के भाति कोई भी आसुरी प्रवृति नही थी. वह हमेसा देवताओ के आरधना में और पूजा-पाठ के कार्यो में तल्लीन रहता था. परन्तु एक दिन गय के कुछ असुर साथियो ने उसे देवताओ की आराधना करते देखा तो वे उसका अपमान करने लगे. अपने असुर साथियो के अपमान से गय बहुत दुखी हुआ और सोचने लगा की भले ही वह असुर कुल में पैदा हुआ है परन्तु उसके संत परवर्ती का होने के कारण उसे असुरो द्वारा सम्मान प्राप्त नही होगा तो क्यों ना ऐसे कार्य किया जाय जिससे वह असुरो के मध्य सम्मान का पात्र बने.

अपने आप को असुरो की नजरो में उँचा उठाने के लिए असुर गय हिमालय पर्वत में जाकर घोर तपश्या में लीन हो गया तथा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने लगा. उसकी घोर तपश्या को देख भगवान विष्णु उसके सामने प्रकट हुए तथा उस वरदान मागने के लिए कहा. गयासुर ने भगवान विष्णु को अपने सामने देख अपने दोनों हाथ जोड़ उनसे बोला हे ! प्रभु आप मुझ में वास करे, मुझे एक बार देख लेने वाले व्यक्ति के समस्त जन्मो के पाप नष्ट हो जाए तथा उसे आपके धाम में निवास मिले. भगवान विष्णु के तथास्तु कहते ही गयासुर का पूरा शरीर पवित्र हो गया मात्र उसे देख भर लेने से लोगो को मोक्ष की प्राप्ति होने लगी.

भगवान विष्णु के वरदान के कारण जब यमलोग की व्यवस्था गड़बड़ाने लगी तो यमराज अपनी समस्या लेकर त्रिदेवो के पास गए और उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया. यमराज बोले की गयासुर के कारण पापी व्यक्ति भी अब भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम को पा जाते है जिस कारण पूरा नरक खली पड़ा है कृपया शीघ्र इस समस्या का निवारण करे. यमराज की समस्या के निवारण हेतु स्वयं ब्रह्मा जी गयासुर के पास गए और उससे कहा की गयासुर तुम्हार शरीर बहुत ज्यादा पवित्र है और में एक ऐसा स्थान ढूढ़ रहा हु जो तुम्हारे शरीर के समान पवित्र हो ताकि में एक महान यज्ञ का कार्य सम्पन्न कर सकू.गयासुर ब्रह्मा के मुह से यह बात सुनकर उत्सुकतावश बोला यदि आप को अपने यज्ञ के लिए कोई पवित्र स्थान चाहिए तो आप मेरे पीठ पर यज्ञ कर सकते है.

ब्रह्मा जी के आदेश पर गयासुर उत्तर दिशा की ओर सर तथा दक्षिण दिशा की ओर पैर करके लेट गया तथा उसके पीठ पर ब्रह्मा सहित समस्त देवता विराजमान होकर यज्ञ का कार्य आरम्भ करने लगे. परन्तु देवताओ के गयासुर के पीठ पर विराजमान होने के कारण भी वह अचल नही हुआ तथा उस परिस्थिति में भी वह लोगो के पास जा-जाकर उन्हें मोक्ष के द्वार पर पहुंचा रहा था. अंत में गयासुर को अचल करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु को धर्मशीला और अपनी गदा के साथ उसकी पीठ में बैठना पड़ा जिस से गयासुर अचल हो गया. गयासुर ने भगवान विष्णु से कहा प्रभु आपने स्वयं क्यों कष्ट किया यदि आप कहते तो में स्वयं अपने प्राण शून्य कर लेता. गयासुर के भक्ति प्रेम को देख भगवान विष्णु उस से अत्यंत प्रसन्न हुए तथा उसे फिर से वरदान मागने को कहा. तब गयासुर बोला भगवन जिस स्थान पर में लेटा हु मुझे यही पत्थर की शीला बना दीजिये तथा यह स्थान मेरा नाम से जाना जाय. जो कोई व्यक्ति अपने पूर्वजो के श्राद्ध एवं पिंडदान के लिए यहाँ आये उसके समस्त पूर्वजो को मोक्ष की प्राप्ति हो तथा उनका उद्धार हो. इस प्रकार गयासुर के नाम से तीर्थ स्थल गया का निर्माण हुआ जहा दुनिया भर से लोग आकर अपने पितरो का श्राद एवं पिंडदान करवाते है !

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