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जानिये पांच अनमोल बाते, जो स्वयं महादेव शिव ने बताई थी माँ पार्वती को !

महादेव शिव समय समय पर माता पार्वती की जिज्ञास शांत करने के लिए उन्हें अनेक महत्वपूर्ण बाते बताते रहते है. ये बाते समाजिक, परिवारिक तथा वैवाहिक आदि से भी जुडी होती है जो पुरे समाज के लिए कल्याणकारी होती है. आइये जानते है वे अनमोल पांच बाते जो भगवान शिव ने माता पर्वती को बताई थी तथा जिनके पालन करना हर मनुष्य का परम कर्तव्य है.

1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप

माता पार्वती भगवान शिव से यह पूछती है की आखिर मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप क्या है, शिव उनकी शंका मिटाते हुए उन्हें उनके इस प्रश्न का उत्तर देते है.

श्लोक:- नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्.

अर्थ:- मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म होता है सत्य बोलना तथा सत्य का साथ देना. मनुष्य यदि झूठ बोलता है अथवा वह झूठ का साथ देता है तो यह सबसे बड़ा अधर्म है.

इसलिए हर मनुष्य को अपने मन, अपने कामो तथा अपनी बातो से हमेशा उन व्यक्तियों को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए जिनमे सच्चाई हो तथा हर परिस्थिति में सत्य का मार्ग अपनाना चाहिए क्योकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नही. असत्य कहना या किसी भी प्रकार से असत्य का साथ देना मनुष्य के जीवन के बर्बादी का कारण बन शक्ति है.

2 कुछ भी करने से पूर्व रखे इस बात का ध्यान

श्लोक:- आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे.
अर्थ:- मनुष्य को उसके हर काम का साक्षी खुद ही बनाना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा कर्म हो या बुरा. मनुष्य को कभी यह नही सोचना चाहिए की उसके कर्मो को कोई देख नही रहा.

कई लोग कोई गलत काम करते समय मन में यह भाव रखते है की उन्हें उनके इस कार्य को करते हुए कोई नही देख रहा जिस कारण उन्हें उस कार्य को करते समय किसी भी चीज़ का भय नही रहता परन्तु वास्तविकता का उसे ज्ञान नही होता. अतः मनुष्य को अपने हर कर्म का साक्षी खुद ही होना चाहिए. यदि मनुष्य कोई भी पाप करने से पूर्व यह भाव अपने मन में रखेगा तो वह अपने आप को किसी भी पाप कर्म करने से रोक लेगा.

3 हमेशा अपने नियंत्रण में रखे ये तीन चीज़े

श्लोक:- मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्.
अर्थ:- मनुष्य को हमेसा अपनी वाणी, मन और कर्मो पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योकि मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है.

मनुष्य को कभी भी अपने मुह से किसी के लिए भी अपशब्द नही निकालने चाहिए तथा उसे अपने मन को अपने नियंत्रण में रखना चाहिए क्योकि यदि मनुष्य इन पर अपना काबू नही रख पाता तो यही अंत में मनुष्य के सर्वनाश का कारण बनते है. मनुष्य को कभी भी अपने कर्मो द्वारा किसी व्यक्ति को दुःख नही पहुचना चाहिए. हमारे बुरे कर्मो के कारण हमे इस जन्म में तो इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी साथ ही मृत्यु के पश्चात नरक की यातनाए भी झेलनी पड़ेगी.

4 जीवन में सफलता पाने के लिए रखो इस एक बात का ध्यान

संसार में मनुष्य को कोई न कोई वस्तु अत्यधिक प्रिय होती है या मनुष्य का उस ओर अत्यधिक लगाव हो जाता है जिस कारण लगाव और मोह का एक जाल सा बन जाता है जिससे बहार निकल पाना मनुष्य के लिए असम्भव सा हो जाता है. इससे मुक्ति पाए बिना मनुष्य कभी भी सफलता नही पा सकता अतः भगवान शिव ने इस से बचने का एक उपाय बताया है.

श्लोक:- दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते। अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते.

अर्थ:-मनुष्य को जिस किसी भी वस्तु आदि से लगाव होता प्रतीत हो रहा हो उसे उस वस्तु में दोष ढूढ़ना आरम्भ कर देना चाहिए. सोचना चाहिए की यह कुछ पल का लगाव हमारे सफलता में बाधा उतपन्न कर रहा है जो हमारी पूरी जिंदगी को व्यर्थ कर देगा. इस प्रकार सोचने से मनुष्य धीरे-धीरे अपने आपको उस वस्तु के मोह से दूर होता हुआ पायेगा और अपने कामो में सफल होने लगेगा.

5 :- इस तथ्य को जान लेने पर मनुष्य कभी दुखी नही रहेगा

श्लोक:-नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्.
सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते.
अर्थ:-यदि मनुष्य अपनी तृष्णा अथवा इच्छाओ पर काबू पा ले तो उसे किस भी प्रकार के दुःख का समना नही करना पड़ेगा क्योकि मनुष्य की अनावश्यक इच्छा ही समस्त दुखो की जननी होती है.

भगवान शिव के द्वारा माता पार्वती को समझाये गए इस श्लोक में जीवन के समस्त दुखो के निवारण की बात कहि गई है. वास्तव में मनुष्य अपने मन के वश में होता है तथा वह अपनी अनावश्यक इच्छाओ और जरुरतो में फर्क ही नही कर पाता. अपनी अनावश्यक इच्छाओ की पूर्ति के लिए वह ऐसे कार्य करने शुरू कर देता है जो अंत में उसके सबसे बड़े दुःख का कारण बनते है. अतः मनुष्य को अपने मन को नियंत्रण में रखते हुए अपने अनावश्यक इच्छाओ का त्याग करना चाहिए तथा शांत जीवन व्यतीत करना चाहिए.

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