आखिर किस कारण परशुराम ने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन रखा !

भगवान विष्णु के छठे अवतार का नाम है परशुराम जो त्रेतायुग में हुए तथा इन्हे आज भी जीवित माना जाता है. परशुराम के बारे में यह भी कहा जाता है के वह तब सब के सामने प्रकट होंगे जब इस धरती में कल्कि का अवतार होगा. परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे तथा उन्होंने 21 बार क्षत्रियो के वंश का संहार किया था.

एक बार महिष्मति नगर के राजा सहस्त्रार्जुन ने दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए घोर तपश्या करी. दत्तात्रेय उसकी तपश्या से प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मागने को कहा तो सहस्त्रार्जुन ने 10,000 हाथो का आशीर्वाद माँगा. सहस्त्रार्जुन का वास्तविक नाम अर्जुन था तथा 10,000 हाथो के कारण ही उसका नाम सहस्त्रार्जुन पड़ा. सहस्त्रार्जुन अपने 10,000 हाथो के कारण अत्यंत बलशाली हो गया था तथा उसे अपने इस बल पर अत्यधिक घमंड आ गया. वह निर्दोष प्राणियों की हत्या करने लगा व ब्राह्मणो का अपमान कर धार्मिक ग्रंथो को मिथ्या बताने लगा.

एक बार सहस्त्राजुन अपनी सेना के साथ वन में शिकार खेलने को गया तथा लौटते वक्त उसे थकान महसूस हुई तो वो विश्राम के लिए स्थान ढूढ़ने लगा. कुछ दुरी पर ही उसे ऋषि जमदग्नि का आश्रम दिखा तो सहस्त्राजुन अपने सेना के साथ उनके आश्रम में विश्राम के लिए रुका. ऋषि जमदग्नि ने सहस्त्राजुन की खूब आदर सत्कार किया तथा उसके सेवा में कोई कमी न आने दी. ऋषि जमदग्नि के पास एक अद्भुत तथा चमत्कारी कामधेनु गाय थी जिसे स्वर्ग के राजा इंद्र ने ऋषि जमदग्नि को भेट स्वरूप दी थी. इस गाय की सहायता से ऋषि जमदग्नि ने देखते ही देखते सहस्त्राजुन और उसकी सेना के लिए पल भर में ही भोजन के व्यवस्था कर दी.

कामधेनु के इस अद्भुत चमत्कार को देख सहस्त्राजुन स्तम्भित रह गया तथा उसे कामधेनु के आगे उसके राज्य का भोग-विलास फीका लगने लगा. उसे कामधेनु गाय को पाने की लालसा उत्पन्न हुई. उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु गाय मांगी परन्तु ऋषि ने कामधेनु को प्रबंधन और आश्रम का एकमात्र जीवन यापन का जरिया बताकर उसे सहस्त्रबाहु को देने से मना कर दिया. इस पर सहस्त्रबाहु क्रोधित हो गया तथा उसने ऋषि के आश्रम को पूरी तरह से उजाड कर कामधेनु को पकड़ने का प्रयास किया परन्तु कामधेनु गाय उसकी पकड़ में आने से पूर्व ही स्वर्ग की ओर चल दी.

जब परशुराम आश्रम पहुंचे तो उनके आश्रम और माता पिता के हाल को देख वे बहुत क्रोधित हो गए तथा सहस्त्रबाहु की हत्या की प्रतिज्ञा ली. महिष्मति नगर जाकर उन्होंने सहस्त्रबाहु के सभी भुजाओ को काट डाला और उसका सर धड़ से अलग कर वध कर डाला. सहस्त्रार्जुन के वध के बाद परशुराम अपने पिता की आज्ञा से प्रायश्चित के लिए तीर्थ को चले गए. इसी दौरान सहस्त्रार्जुन के पुत्रो और उनके कुछ साथियो ने मौका देख ऋषि जमदग्नि तथा आश्रम के समस्त ऋषियों का वध कर दिया.

परशुराम की माता ने विलाप स्वर में परशुराम का नाम लिया. माता का स्वर सुन परशुराम जब आश्रम पहुंचे तो उन्होंने आश्रम उजड़ा हुआ पाया तथा वही एक जगह पर उनकी माता लेटी विलाप कर रही थी और पिता का कटा सर पड़ा था जिसमे 21 घाव थे. उस दिन से ही उन्होंने प्रतिज्ञा ली की वे इस पूरी पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन कर देंगे. भगवान परशुराम ने 21 बार क्षत्रियो के पुरे वंश का वध किया तथा उनके रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र के पांच सरोवर को भर अपना संकल्प पूरा किया !

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