जानिए कैसे किया भगवान श्री कृष्ण ने अपने सबसे प्यारे भक्त का अभिमान चूर !

Story of krishna and arjuna:

Story of krishna and arjuna एक बार अर्जुन को यह अभिमान हो गया कि वह भगवान श्री कृष्ण का सबसे बड़ा भक्त है इसलिए तो वे महाभारत युद्ध में अर्जुन के सारथी बने है लेकिन सर्वज्ञाता भगवान श्री कृष्ण से कुछ नही छुपा होता वे जान गए की अर्जुन को उसकी भक्ति पर घमंड हो गया है. अतः एक दिन प्रातः वे अर्जुन के कक्ष में आये और उनसे उनके साथ भ्रमण की इच्छा रखी. अर्जुन ने हामी भर दी और पास के ही वन में भ्रमण को चल दिए. मार्ग में उन्होंने एक गरीब ब्राह्मण को देखा जो विचित्र व्यवहार कर रहा था. वह ब्राह्मण जमीन से सुखी घास उठा कर खा रहा था और उसके कमर में एक तलवार लटकी हुई थी. अर्जुन ने उस ब्राह्मण के निकट जाकर कहा, ब्राह्मण देव आप तो अहिंसा के पुजारी है तथा जीव हत्या के भय से सुखी घास खा कर गुजारा कर रहे है फिर भी आप के कमर में यह हिंसा का प्रतीक तलवार क्यों लटक रहा है.

ब्राह्मण ने जवाब दिया की में अपने कुछ शत्रुओ की तलाश में हु. अर्जुन को जिज्ञासा हुई की Story of krishna and arjuna आखिर इस ब्राह्मण के शत्रु कौन हो सकते है तथा उन्होंने उन शत्रुओ के बारे में ब्राह्मण से पूछा. ब्राह्मण ने कहा की मैं चार लोगो को ढूढ़ रहा हु जिन लोगे ने मेरे प्रभु के आराम में बाधा डाल रखी है. मै उन्हें ढूढ कर प्रताड़ित करना चाहता हु लेकिन सबसे पहले तो में नारद मुनि की खोज में हूँ जो मेरे प्रभु को आराम नही करने देते तथा अपने भजन कीर्तन से उन्हें जागृत रखते है.

दूसरा में द्रोपदी से क्रोधित हूँ क्योकि उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा जब वह भोजन कर रहे थे तथा तुरंत ही उन्हें पांडवो को दुर्वासा ऋषी के श्राप से बचाने के लिए जाना पड़ा. उसकी धृष्टता तो देखो उसने मेरे प्रभु को झूठा भोजन कराया. अर्जुन ने उस ब्राह्मण से उसके तीसरे शत्रु के बारे में पूछा ?

ब्राह्मण बोला तीसरा शत्रु मेरा हिृदयहीन प्रह्लाद है क्योकि उस निर्दयी के कारण मेरे प्रभु को गर्म तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया गया, हाथी से कुचलवाया गया तथा अंत में उन्हें खम्बे से प्रकट होने के लिए विवश होना पड़ा. जब ब्राह्मण ने अपने चौथे शत्रु के बारे में बताया तो अर्जुन के आँखे आश्चर्य से खुली की खली रह गई.

ब्राह्मण बोला चौथा शत्रु मेरा अर्जुन है. उस दुष्ट की दुष्टता तो देखो, उसने मेरे प्रभु को अपने रथ का सारथि बनाया है उसे उनके कष्ट की तनिक भी चिंता नही. कितने कष्ट में है मेरे प्रभु यह कहते ही ब्राह्मण के आखो से आँशु आने लगे.यह देखते ही अर्जुन का अभिमान क्षण भर में ही चूर चूर हो गया. वे भगवान श्री कृष्ण से माफ़ी मांगने लगे तथा कहा मान गया प्रभु, आपकी महिमा मेरे समझ के परे है. आप के इस संसार में असंख्य ऐसे भक्त होंगे जिनके सामने मैं तो एक तिनके के अलावा कुछ भी नही !

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