क्यों लेना पड़ा था भगवान विष्णु को वराह अवतार !

vishnu varaha avatar

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एक बार भगवान विष्णु वैकुण्ठ धाम में विश्राम कर रहे थे. उनके दो द्वारपाल जय और विजय वैकुण्ठ धाम के द्वार पर पहरेदारी कर रहे थे ताकि भगवान विष्णु की निद्रा में कोई बाधा ना आये. तभी उन्होंने देखा ब्रह्मा के चार पुत्र उन्ही के समीप आ रहे है. जैसे ही ब्रह्मा के पुत्रो ने बैकुंठ धाम के अंदर प्रवेश करने का प्रयास किया उन्हें द्वारपालों ने द्वार में ही रोक लिया.

ब्रह्मा के पुत्रो ने क्रोध में आकर उन्हें श्राप दिया की तुम देवीय पद छोड़, पृथ्वी में मानवीय रूप लोगे. इसे सुन वे दोनों घबरा गए. जब भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जागे और उन्हें पूरी घटना का पता चला तो उन्होंने ब्रह्म पुत्रो से जय और विजय के व्यवहार के लिए उनसे माफ़ी मांगी और कहा ये दोनों तो अपने कृतव्यो का पालन कर रहे थे. ब्रह्म पुत्रो ने भगवान विष्णु से कहा की हम अपना श्राप वापिस तो नही ले सकते परन्तु जब इन द्वारपालों की मनुष्य रूप में तुम्हारे द्वारा मृत्यु होगी तो ये पुनः देव पद को प्राप्त करेंगे.

इस तरह जब जय और विजय ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में दिति के गर्भ से जन्म लिया तो पूरी धरती हिलने लगी. नक्षत्र और आकाश में लोग इधर-उधर जाने लगे. नदियों में प्रलयकारी लहरे उठने लगी. बहुत तेजी से हवाएँ चलने लगी मानो प्रलय आ गया हो.

कई वर्षो बाद जब हिरण्याक्ष जवान हुआ तो वह तप करने एक पर्वत जा पहुंचा. वहाँ उसने घोर तपश्या कर ब्रह्मा जी को प्रश्न किया उसने वरदान माँगा की मुझे देवता, असुर और मनुष्य में से कोई भी ना मार सके. ब्रह्म जी ने यह वरदान उसे दे दिया.

वरदान पाते ही हिरण्याक्ष अपने आप को सर्वशक्तिमान समझ बैठा. वह अपने समक्ष देवता सहित त्रिदेवो को भी तुच्छ समझने लगा. वह अपने एक हाथ में गदा ले इंद्र लोक जा पहुंचा. उसके आने की खबर सुनते ही इन्द्रलोक में भगदड़ मच गई. इंद्र समेत सभी देवता अपनी जान बचाने के लिए स्वर्ग से भागे. हिरण्याक्ष ने पुरे स्वर्ग में अपना अधिकार स्थापित कर लिया. जब इन्द्रलोक में हिरण्याक्ष को युद्ध करने के लिए कोई नही मिला तो वह वरुण देव की राजधानी विभावरी नगरी जा पहुंचा.

वहाँ पहुँचते ही उसने वरुण को ललकारा और कहा वरुण देव तुमने देत्यो को हराकर राजसूय यज्ञ किया था. अगर तुम में अब बल है तो मुझे परास्त करो. वरुण देव जानते थे की उसे हराना उन के वश में नही क्योकि उसे ब्रह्म देव का वरदान प्राप्त है. अतः उन्होंने हिरण्याक्ष से कहा की तुम महान शूरवीर और अति पराक्रमी हो. में तो क्या तिनोलोको में तुम्हे कोई भी नही हरा सकता सिर्फ भगवान विष्णु को छोड़. तुम उनके पास जाओ और अपने पराक्रम उन के सामने दिखाओ.

यह सुन हिरण्याक्ष से रहा नही गया. वह भगवान विष्णु की खोज में इधर उधर भटकने लगा. जब उसे भगवान विष्णु नही मिले तो उसने पूरी पृथ्वी को गोल गेंद के रूप में समेट लिया और समुद्र के अंदर पाताल लोक में चला गया. जब समस्त देवताओ ने देखा की हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को चुरा लिया है जिस से सृष्टि की प्रक्रिया बाधित हो रही है तो वे भगवान विष्णु के शरण में गए.

तब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण किया और पाताल लोक हिरण्याक्ष के समक्ष पहुंचे. उन्हें देख हिरण्याक्ष कटु शब्दों का उच्चारण करने लगा. उसने अपने शक्तियों द्वारा वराह जी पर विभिन्न प्रकार के अश्त्रों से प्रहार किया. वराह भगवान ने सुदर्शन चक्र द्वारा उसके सभी वारो को विफल कर दिया. अंत में उसने जब वराह जी पर एक गदा से प्रहार किया तो भगवान वराह ने बिना अश्त्र के उस गदा को पकड़ दूर फेक दिया. वराह रूपी भगवान विष्णु ने उस पर अपने मुठी के एक प्रहार से उसे विष्णुलोक पहुंचा दिया. इस तरह हिरण्याक्ष फिर से भगवान विष्णु का द्वार प्रहरी बन गया !

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