जब महावीर हनुमान धनुधारी अर्जुन से हारे एक शर्त और तैयार हुए अग्नि में कूदने को, आखिर क्यों !

story of arjun and hanuman

story of arjun and hanuman

प्रभु राम के विषय में हमे अलग-अलग  पुराणो और ग्रंथो  से कुछ अनोखे प्रसंग मिलते है, जिनमे से एक अनोखा प्रसंग आनंद रामायण में भी है. इस रामायण में महाभारत के पात्र अर्जुन और पवनपुत्र हनुमान के बारे में एक प्रसंग उल्लेखित है जिसमे हनुमान, धनुधारी अर्जुन से एक शर्त हार बैठे थे और शर्त के अनुसार पराजित होने वाले व्यक्ति को अग्नि में अपनी आहुति देनी थी.

एक दिन अर्जुन श्री कृष्ण को सूचित किये बिना अपना रथ ले वन भ्रमण को निकल पड़े तथा घूमते-घूमते वे रामेश्वरम तीर्थ पहुंच गए. वहा पहुंच कर उन्होंने अपनी थकान दूर करने के लिए थोड़ा विश्राम करने की सोची तथा निकट ही प्रवहित हो रही नदी में स्नान की इच्छा से उतरे. तभी नदी के तट पर उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा, एक विशाल वानर तट के समीप ही ध्यान मुद्रा में बैठा था व भगवान राम के नाम का जप कर रहा था. उस तेजसमयी वानर को देख अर्जुन से रहा नही गया तथा वह उस परम तपश्वी के समीप पहुंच व  बोले ” हे असाधारण से प्रतीत होने वाले वानर, आखिर आप कौन है”.

अर्जुन के वचनो को सुन पवनपुत्र हनुमान  बोले, जिस राम के प्रताप से मैने लंका में प्रवेश करने के लिए सौ योजन विस्तृत सेतु बनाया था  मै वही हनुमान हू. हनुमान जी के कहि बातो को सुन अचानक अर्जुन हसने लगे तथा बोले आप के प्रभु श्री राम की तो श्रेष्ठ धनुधारियो मै गिनती होती है तथा उन्होंने अपने इस पराक्रम से रावण जैसे बलशाली योद्धा को हराया था तो फिर उन्हें समुद्र  पार करने के लिए पत्थरो से बने सेतु की क्या आवश्यकता थी इस मे तो अवश्य ही उनका बहुत सा समय नष्ट हुआ होगा. यदि उस समय मै राम की जगह पर होता तो अपने बाणो से ही समुद्र पर सेतु बना देता जिसमे राम सहित उनकी पूरी सेना चढ़कर समुद्र पार कर लेती.

हनुमान जी अर्जुन से बोले की तुम्हार उन बाणो से बना सेतु हम जैसे विशाल वानरों का बोझ सहन नही कर पता और कुछ क्षणों मे ही टूट जाता अतः हमारे हित को ध्यान मे रखते हुए प्रभु राम ने बाणो से सेतु नही बनाया. अर्जुन ने अपने धनुर्विद्या के घमंड मे हनुमान से कहा की अभी मै अपने बाणो के द्वारा आपके सामने इस सरोवर मे एक सेतु का निर्माण करता हू  यदि यह सेतु आपके चलने से टूट गया तो मै अग्नि मे प्रवेश कर जाऊंगा यदि यह नही टुटा तो आपको अग्नि मे प्रवेश करना होगा. अर्जुन के बात सुन हनुमान जी बोले मुझे ये शर्त मंजूर है यदि तुम्हार बाणो द्वारा बने सेतु ने मेरे सिर्फ दो पग ही झेल लिए तो मै अपनी पराजय  स्वीकार कर लूंगा.

तब अर्जुन ने अपने बाणो की सहयता से सरोवर मै एक सेतु का निर्माण कर दिया तथा हनुमान को उसमे चलने का आग्रह किया. हनुमान जी ने अपने प्रभु श्री राम का नाम लेकर उस सेतु मै अपना पहला कदम रखा. उनके पहले कदम रखते ही वह सेतु डगमगाने लगा. दूसरा पैर रखते ही सारा सेतु चरमराने लगा जैसे ही हनुमान ने अपना तीसरा पग उस सेतु मे रखा उस सरोवर का पूरा पानी खून से लाल हो गया. तीसरे पग रखने के बाद हनुमान जी सेतु से बहार निकल आये और अर्जुन से अग्नि प्र्वज्लित करने के लिए कहा.

हनुमान जी जैसे ही उस अग्नि मै कूदने वाले थे उसी समय वहा श्री कृष्ण आ पहुंचे तथा उन्होंने हनुमान जी को अग्नि मै कूदने से रोका. अर्जुन और हनुमान दोनों ने श्री कृष्ण को प्रणाम किया तथा श्री कृष्ण बोले की हनुमान आपके पहले ही कदमो से वह सेतु टूट गया था परन्तु मै अर्जुन और आपको किसी साधारण सी बात के लिए मरने नही दे सकता था अतः मै उस सेतु के नीचे कछुवे के रूप मे लेट गया था व आपके शक्ति के कारण ही मेरे कछुवे के  रूप के शरीर से रक्त बहने लगा था . जब हनुमान को पता चला की उनके कारण भगवान कृष्ण को कष्ट सहना पड़ा तो उन्होंने श्री कृष्ण से माफ़ी मांगी तथा दोनों एक दूसरे के गले लग गए !