भगवान राम नही बल्कि माता सीता के द्वारा हुआ था राजा दशरथ का पिंडदान !

Sita did pind daan of dashrath:

Sita did pind daan of dashrath राजा दशरथ को उनके ज्येष्ठ पुत्र राम बहुत प्यारे थे. राम के वियोग में ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे. राजा दशरथ का अन्तिम संस्कार भरत और शत्रुघन के द्वारा हुआ लेकिन क्या आप को पता है की राजा दशरथ का पिंडदान उनकी पुत्रवधु और श्री राम की धर्मपत्नी देवी सीता के द्वारा हुआ था.

पौराणिक कथा के अनुसार राम जी के वनवास चले जाने के कारण, उनके पिता राजा दशरथ की मृत्यु पर उनके अंतिम संस्कार के सारे विधी-विधान भरत और शत्रुघन ने करे. परन्तु राजा दशरथ का पुत्र राम के प्रति अत्यधिक प्रेम होने के कारण उनकी अंतिम संस्कार की बची हुई राख गया में एक नदी के पास पहुंची जहा भगवान राम देवी सीता और भाई लक्ष्मण वन भ्रमण के दौरान पहुंचे थे. भगवान राम और लक्ष्मण नदी में नहाने उतरे तथा Sita did pind daan of dashrath देवी सीता नदी के तट पर ही बैठी, हाथ में रेत लिए विचारो में मग्न थी. तभी अचानक रेत में उन्हें एक अजीब सी हलचल दिखी और उसी समय रेत में राजा दशरथ की एक हल्की सी आकृति उभरी. देवी सीता समझ गई की यह राजा दशरथ की आत्मा की राख है जो उनसे कुछ कहना चाहती है. तभी उन्हें राजा दशरथ की एक हलकी सी आवाज सुनाई दी, राजा दशरथ ने माता सीता से उनके कम समय होने की बात कहि और पिंडदान करने को कहा. देवी सीता ने नदी की ओर राम और लक्ष्मण को देखा तो वे नदी में ध्यानमग्न थे.

Sita did pind daan of dashrath

Sita did pind daan of dashrath तब देवी सीता ने बिना समय गवाए उस फाल्गुन नदी के तट पर राजा दशरथ के पिंडदान करने का विचार किया. उन्होंने राजा के राख को रेत में मिलाकर हाथ में उठाया तथा फाल्गुनी नदी, गाय, तुलसी, अक्षय वट और एक ब्राह्मण को इसका साक्षी बनाया. जब देवी सीता ने पिंडदान की रस्म पूरी करी उसी समय राम और लक्ष्मण नदी से बाहर आये. देवी सीता ने उन्हें राजा दशरथ के पिंडदान की बात बताई. यह सुनकर राम को सीता पर विश्वास नही हुआ, अंत में सीता ने उन पांच साक्षियों को बुलाया तथा राम को सत्य बताने को कहा.

परन्तु फाल्गुनी नदी, गाय, तुलसी और ब्राह्मण राम के क्रोध से डर गए और असत्य कहा की इस तरह की कोई घटना घटित ही नही हुई थी.अक्षय वट ने सत्य बोलते हुए माता सीता का साथ दिया.यह सुन देवी सीता क्रोध में आ गई और उन्होंने चारो जीवो को श्राप दे दिया. अक्षय वट को वरदान देते हुए देवी सीता बोली आज से तुम पूजनीय होगे जो भी गया में पिंडदान करने आएगा वह तुम्हारी भी पूजा करेंगे.बगैर तुम्हरी पूजा करे उसका पिंडदान सफल नही होगा.तथा जिन को श्राप दिया उनमे गाय को श्राप देते हुए माता सीता बोली तुम लम्बे समय तक नही पूजे जाओगे. फाल्गुन नदी को श्राप दिया की तुम्हारा पानी सुख जायेगा.आज भी इस नदी का वर्षा में भी पानी कभी ज्यादा नही होता.वही तुलसी को गया में न उगने का श्राप दिया. ब्राह्मण को श्राप दिया की वह कभी संतुष्ट नही रहेगा. वस्तुओ को पाने की लालशा उस में हमेशा रहेगी.

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