जब मूर्छित किया अर्जुन को उन्ही के पुत्र ने और संजीवनी मणि ने बचाये अर्जुन के प्राण !

sanjivani mani mahabharat story

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महाभारत हिन्दुओ का प्रमुख काव्य ग्रन्थ है जिसमे सत्य की असत्य पर विजय की बात कही गई है. यह तो सभी जानते है की महाभारत का भयंकर युद्ध कौरवो और पांडवो के मध्य लड़ा गया जिसमे पांडवो की विजयी हुई थी परन्तु महाभारत के कुछ अनसुने तथ्य भी है जिनसे शायद ही आप परिचित हो. ऐसी ही महाभारत से जुडी एक कथा है जिसमे धनुधर अर्जुन का युद्ध उनके पुत्र के साथ हुआ.

अर्जुन ने द्रोपदी और सुभद्रा के आल्वा दो अन्य युवतियों से भी विवाह किया था जिनमे एक नाग कन्या उलूपी थी तथा दूसरी मणिपुर की राजकुमारी चित्रागंद थी. राजकुमारी चित्रागंद से अर्जुन को बर्भुवाहन पुत्र के रूप में प्राप्त हुआ जिसने एक युद्ध में अपने ही पिता अर्जुन को  मूर्छित  किया. अर्जुन का अपने ही पुत्र के हाथ मूर्छित होने का कारण था एक श्राप. अपने पूर्व जन्मो में भीष्म पितामह चार वसुओं (नाग देवता) में से एक थे तथा अर्जुन दवारा उनके वध करने के कारण अर्जुन को श्राप के रूप में अपने पुत्र से ही युद्ध में मृत्यु के समीप जाना पड़ा.

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पाण्डु पुत्र युधिष्ठर भीष्म पितामह की मृत्यु के कारण दुखी रहने लगे व उनका राज्य की ओर से मन हटने लगा. तब भगवान श्री कृष्ण और ऋषि वेदव्यास युधिस्ठर के पास आये तथा उन्हें धर्मपूर्वक शासन करने को कहा साथ ही उन्हें अश्वमेध यज्ञ करने का परामर्श दिया. जब युधिष्ठर ने ऋषि वेदव्याश को महाभारत युद्ध के कारण राजकोष खाली होने की बात बताई तो ऋषि बोले वर्षो पूर्व राजा मरुत्त ने बहुत ही बड़े यज्ञ का आयोजन किया था तथा इस यज्ञ के अंत में उन्होंने ब्राह्मणो को काफी अत्यधिक मात्रा में स्वर्ण दान दिया था. इन स्वर्णो को ब्राह्मणो ने हिमालय पर्वत की एक गुफा में रख दिया था जिसे तुम अश्वमेध यज्ञ के लिए उपयोग में ला सकते हो.

ऋषि वेदव्यास और भगवान कृष्ण के परामर्श से युधिष्ठर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया तथा यज्ञ के बाद छोड़े जाने वाले घोड़े का रक्षक अर्जुन को बनाया गया. अब घोडा जिस-जिस राज्य से होकर जाता अर्जुन उन राज्य के राजाओ से युद्ध लड़ कर उनके राज्य को हस्तिनापुर के अधीन करते जाते. इस तरह घोडा अनेक राज्यों का भर्मण करते हुए मणिपुर पहुंच गया जहाँ का राजा अर्जुन का ही पुत्र बर्भुवाहन था. जब बर्भुवाहन को अर्जुन के आने का समाचार प्राप्त हुआ तो वे खुद नगर के द्वार पर अपने पिता का स्वागत करने पहुंचे. जैसे ही बर्भुवाहन अपने पिता के स्वागत के लिए उनकी और बढ़ा तो अर्जुन ने बर्भुवाहन को रोका और कहा की मुझ से युद्ध करो क्योकि इस समय में घोड़े की रक्षा करता हुआ तुम्हारे राज्य में आया हुआ हु.

अपने पिता के कहने पर बर्भुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया तथा दोनों के बीच बहुत भयंकर युद्ध शुरू हो गया. दोनों ही वीर युद्ध कला में माहिर थे. अर्जुन अपने पुत्र की युद्ध कुशलता को देख बहुत प्रसन्न हुए. बर्भुवाहन युद्ध में इतना लीन हो गए थे की बिना परिणाम जाने उन्होंने अपने पिता अर्जुन पे एक तीखा बाण चलाया. वह बाण जैसे ही अर्जुन को लगा वे मूर्छित हो कर धरती पर गिर गए. अपने पिता को मूर्छित देख बर्भुवाहन उनके पास गए तथा पिता के शरीर में जीवित होने का कोई भी चिन्ह न देख वे रोने लगे. उसी समय बर्भुवाहन की माता चित्रगंदा व सौतेली माता उलूपी भी वहा आई व अपने पति को मूर्छित अवस्था में देख चित्रगंदा रोने लगी. बर्भुवाहन और चित्रगंदा की बुरी स्थिति होते देख उलूपी ने संजीवन नामक मणि बर्भुवाहन के हाथ में पकड़ाते हुए कहा इसे अपने पिता के शरीर से छुवाओ. मणि छुवाते ही अर्जुन के मृत पड़े शरीर में फिर से प्राण आ गए. जब अर्जुन जीवित हुए तो उन्होंने उलूपी से उन के पुनः जीवित होने का रहस्य पूछा तब उल्पी ने कहा यह सब मेरी माया थी यह सब तुम्हे इसलिए सहना पड़ा क्योकि तुम ने भीष्म को छल से मारा था जो पूर्व जन्म में नाग देव वसु थे. इसके बाद अर्जुन अपनी दोनों पत्नियों व अपने पुत्र बर्भुवाहन से मिल यज्ञ के घोड़े के साथ आगे की यात्रा पे निकल पड़े !

 

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