जया एकादशी का महत्व !

Importance of jaya ekadashi:

Importance of jaya ekadashi जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष को आती है जिसे अजा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के ”उपेन्द्र” रूप की पूजा-आराधना की जाती है तथा रात्रि को जागरण किया जाता है. यह एकादशी सभी पापो का नाश करने के साथ-साथ मोक्ष प्रदान करने वाली है व इस एकादशी का फल लोक और परलोक दोनों में उत्तम कहे गए है. इस एकादशी के व्रत से हजारो गोदान का फल प्राप्त होता है. इस एकादशी के पुण्य से व्यक्ति नीच योनि, प्रेत, भुत अादि से मुक्ति पा लेता है व जाने अनजाने में किये गए पाप भी माफ़ हो जाते है.

पुराणो में Importance of jaya ekadashi जया एकादशी के महत्व को समझाते हुए एक कथा श्री कृष्ण ने युधिस्ठिर को सुनाई. इस कथा के अनुसार नंदन वन में एक उत्स्व चल रहा था जिसमे सभी देवता एवं सिद्ध पुरुष सम्मलित थे. इस उत्स्व में गन्धर्व नृत्य का आयोजन किया गया था व इस नृत्य का हिस्सा मालयवान नामक गन्धर्व और पुष्पवती नामक गन्धर्व कन्या भी थी. नृत्य के दौरान ही ये दोनों एक दूसरे पर आकर्षित हुए और अमर्यादित नृत्य करने लगे जिसे देख देवराज इंद्र को क्रोध आ गया. देवराज इंद्र ने दोनों को श्राप देते हुए कहा की आप दोनों स्वर्ग से हमेशा के लिए वंचित हो जाये व पृथ्वी लोक आप का निवास हो तथा मृत्यु लोक में तुम दोनों सबसे नीच योनि पिशाच बन कष्ट भोगो. इस के बाद तुरंत वे दोनों पिशाच बन गये तथा हिमालय पर्वत के एक वृक्ष में उनका ठिकाना बन गया. दोनों अत्यंत कष्ट भोग रहे थे.

Importance of jaya ekadashi

 

एक दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को वे दोनों बहुत दुखी थे तथा उस दिन उन्होंने फल के अलावा कुछ और नही खाया था. उस रात बहुत ठंड होने के कारण वे जागते रहे जिस कारण अनजाने में ही उन्होंने जया एकादशी का व्रत पूर्ण कर लिया और उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गयी तथा वे स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए. जब इंद्र ने उनसे पूछा की उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति कैसे मिली तब मालयवान ने बताया की भगवान विष्णु की जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति मिली है.

जया एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठ स्नान आदि के बाद भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा धुप, दीप, चन्दन, पुष्प, तिल आदि से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. भगवान विष्णु के सहस्त्रनाम का जाप करे और उनकी कथा सुने. रात्रि को घर में स्थित पूजा स्थल या मंदिर में विष्णु का नाम लेते हुए जागरण करे तथा दूसरे दिन द्वादशी को ब्राह्मणो द्वारा घर में वेदपाठी के बाद दान देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करे. धर्म शास्त्रो के अनुसार जो नियम व विधि पूर्वक एकादशी व्रत को पूर्ण करता है उसे पिशाच योनि में जन्म नही लेना पड़ता !

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