जब भगवन कृष्ण की चतुराई से अर्जुन ने दुर्योधन से मांगे वो 5 तीर जिनसे पलट सकता था महाभारत का परिणाम !

Duryodhana story in hindi:

कौरवो के सेनाओ की संख्या महाभारत के युद्ध में लगातार कम हो रही थी, जिसे देख एक दिन दुर्योधन बहुत चिंतित हुआ. उसे समझ नही आ रहा था की भीष्म पितामाह जैसे सेनापति, दोर्णाचार्यकर्ण जैसे योद्धाओ और कृष्ण की नारायणी सेना उसके पक्ष में होने के बावजूद युद्ध में उसे निरंतर पराजय का मुख देखना पड़ रहा था.

यह सोचते हुए वह उसी पल भीष्म पितामाह के समीप गया और कहा – ” पितामह आप जैसा शक्तिशाली योद्धा हमारे पास होने के बावजूद हमारी सेना युद्ध में हार रही है, इससे मुझे ये प्रतीत हो रहा है की या तो आप पांडवो का साथ दे रहे हो या फिर आप में अब पहले जैसा सामर्थ्य नही रहा आप युद्ध में कमजोर पड़ रहे है “. यह बात सुन भीष्म पितामह  क्रोधित हो गए तथा उसी समय उन्होंने अपने तरकश से पांच तीर निकाल कर उन में मन्त्र प्रभाव से शक्ति भरी और दुर्योधन से कहा कल में इन तिरो से पांचो पांडवो को यमलोक पहुंचाउंगा. अब दुर्योधन के मन में शंका हुई की पांडव तो भीष्म पितामाह के प्रिय थे अतः दुर्योधन को उन पर विश्वास नही हुआ. उसने भीष्म पितामाह से उन तिरो को लेते हुए कहा की मैं इन तिरो को कल युद्ध के समय आप को दूंगा.

भगवान कृष्ण को जब उन तिरो के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्हें पांडवो के विषय में चिंता हुई क्योकि यदि पांडव उन तिरो द्वारा मारे जाते है तो अधर्म की धर्म पर विजय हो जाएगी. तब भगवान कृष्ण ने उस रात्रि को अर्जुन को अपने पास बुलाया और कहा तुम ने एक बार दुर्योधन के प्राण गन्धर्व से बचाये थे. उस समय दुर्योधन ने तुम से उसके प्राण बचाने के बदले में उसकी कोई भी एक चीज़ देनी की बात कही थी और तुमने उसे उचित समय आने पर मागने की बात कही थी. अब वह समय आ गया है क्योकि दुर्योधन के पास पांच अत्यंत शक्तिशाली तीर है जो तुम पांचो भाइयो के अंत के लिए पर्याप्त है अतः दुर्योधन के पास जाके उन तिरो को मांग लो. अर्जुन बिना विलम्ब किये उसी क्षण दुर्योधन के पास पहुंचे और उनसे उन तिरो को माँगा. दुर्योधन एक क्षत्रिय था, क्षत्रिय अपने प्राण देकर भी अपने वचनो को निभाते है. अतः दुर्योधन के ना चाहते हुए भी उसे उन तिरो को अर्जुन को सौपना पड़ा !

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