जब यमलोक हुआ सुना और बिगड़ी वहां की व्यवस्था तो कैसे किया ब्रह्मा ने यम की चिंता का निवारण !

पुराणो के अनुसार ब्रह्मा जी को सृष्टि रचियता, भगवान विष्णु को पालनकर्ता  व शिव को संहारकर्ता माना गया है इसी तरह अन्य देवताओ को उनके सामर्थ्य के अनुसार सृष्टि को चलायमान रखने के लिए कार्य सोपे गए है. यदि इन कर्यो में से कोई भी एक कार्य रुक जाये या किसी कारण प्रभावित  हो जाये तो ब्रह्मा द्वारा सृष्टि को चालयमान रखने के लिए नियोजित अन्य कार्यो में भी बाधा उत्तपन्न होने लगेगी जो पूरी सृष्टि के लिए अहितकर सिद्ध होगी. इसी से संबंधित एक कथा नारद पुराण में भी मिलती है जब पृथ्वी के समस्त व्यक्ति मृत्यु के पश्चात सीधे विष्णुलोक में शरण पा रहे थे तथा यमलोक का नरक इस कारण सुना हो गया था.

एक बार यमराज और चित्रगुप्त के पास यमलोक में कोई कार्य नही रह गया क्योकि पृथ्वी में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होती तो वह सीधे वैकुण्ठधाम चले जाता. ऐसे में यमराज के पास यह समस्या उतपन्न हो गयी थी की आखिर वो किसको उसके कर्मो का दंड दे और चित्रगुप्त यह सोचने लगे आखिर वे किसी व्यक्ति के कर्मो का क्यों हिसाब रखे जब उसे अंत में वैकुण्ठ धाम मिलना निश्चित है.

जब यह समस्या बहुत लम्बे समय तक बनी रही तो एक दिन यमराज और चित्रगुप्त ने एक दूसरे से मंत्रणा की तथा यह हल निकला की उन्हें ब्रह्मा जी के पास चलना चाहिए. दोनों ब्रह्मा जी के पास गए तथा उनके समक्ष अपनी समस्या रखी तथा कहा यदि इस तरह चलता रहा तो आपकी  बनाई व्यवथा ही बिगड़ जाएगी और हमारी कोई उपयोगिता नही रह जाएगी अतः आप को अति शीघ्र इस समस्या का कोई निवारण करना होगा.

ब्रह्मा चिंतित मुद्रा में यमराज  से बोले आखिर यह कैसा हुआ कृपया मुझे विस्तार से बतलाये. तब यमराज बोले की धरती पर रुक्मागंद नाम के एक राजा का राज है जो भगवान विष्णु का परम भक्त है जो राजपाट के बाद अपना अधिकतर समय भगवान विष्णु  की भक्ति में ही खोया रहता है. उसने अपने समस्त प्रजा के हित में कठोर एकादशी का व्रत  रखा है तथा सबको एकादशी व्रत अनिवार्य कर दी है .

एकादशी व्रत  के पुण्य के प्रभाव से पृथ्वी के समस्त प्राणी मृत्यु के बाद सीधे वैकुण्ठ धाम की और प्रस्थान कर रहे है तथा जिस कारण यमलोक सुना पड़ा है. यम की बात सुन जब ब्रह्मा जी ने ध्यान लगाया तो उन्हें पता चला की एकादशी के दिन राजा की ओर से समस्त प्रजा को घोषणा होती थी की इस दिन जो भी व्यक्ति अन्न को छुएगा भी तो उसे मृत्यु दंड दिया जायेगा, जिस कारण वहा की समस्त जनता को एकादशी का व्रत  रखना पड़ता था.

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ब्रह्मा ने यमराज की समस्या  के निवारण के लिए अपने शक्ति के प्रभाव से एक सुन्दर कन्या का निर्माण किया जिसका नाम मोहनी था तथा उसे कुछ समझाकर राजा रुक्मागंद के राज्य में भेजा. राजा रुक्मागंद के पतिव्रता पत्नी का नाम सन्ध्यावली था तथा उन दोनों के पुत्र का नाम धर्मांगद था जो अपने पिता की ही तरह धर्म परायण था. एक दिन जब राजा भ्रमण को वन जा रहे थे तो उन्होंने मार्ग में एक बहुत ही  सुन्दर कन्या को देखा वह कन्या मोहनी थी जिसे ब्रह्मा जी ने भेजा था. उसे देखते ही राजा उस पर आकर्षित हो गए. राजा ने मोहनी के समीप जाकर उस से विवाह का प्रस्ताव रखा तो मोहनी एक शर्त पर राजा से विवाह करने के लिए तैयार हो गई.

विवाह के बाद मोहनी भी राजा के साथ महल में रहने लगी. एक समय हमेसा की तरह एकादशी वाले दिन राजा ने व्रत धारण किया था तथा वे कुछ कार्य कर रहे तभी उनके समीप मोहनी आई तथा उनसे अन्न ग्रहण करने को कहा. जब राजा ने उन्हें व्रत के बारे में बताया तो भी वह नही मानी तथा राजा से अन्न ग्रहण करने की जिद करने लगी. तब राजा ने कहा में अन्न ग्रहण नही कर सकता इसके बदले तुम मुझ से कोई अन्य वर मांग लो. मोहनी बोली अगर आप अन्न ग्रहण नही कर सकते तो मुझे अपने पुत्र का सर काटकर भेट करो.

राजा का पुत्र धर्मांगद एक आज्ञाकारी पुत्र था अपने पिता के लिए उसने अपना सर आगे कर दिया. जब राजा ने मजबूर होकर अपनी तलवार से अपने पुत्र को मारने के लिए अपना  हाथ उठाया तभी वहा भगवान विष्णु प्रकट हुए तथा राजा रुक्मागंद अपनी पत्नी सन्ध्यावली  व पुत्र धर्मांगद के साथ भगवान विष्णु के सशरीर में विलीन हो गए व राजा के पुरोहित वसु ने अपने तप के प्रभाव से मोहनी को उसी समय भष्म कर दिया !

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यमराज मंदिर चम्बा, हिमाचल प्रदेश – यहाँ लगती है यमराज की अदालत !