क्या हुआ जब त्रिदेवियो के घमंड को तोड़ने के लिए त्रिदेवो को बनना पड़ा शिशु !

उस समय देवी अनसूया  आश्रम में अकेली थी, जैसे ही उन्होंने अतिथियों को अपने द्वार पर देखा वे उनसे भोजन ग्रहण करने का निवेदन करने लगी. तीनो देवो ने एक स्वर में कहा हम तभी आपसे भिक्षा लेंगे जब आप अपने सभी वस्त्रो को अलग रखकर भिक्षा देंगी. ब्रह्मणो के इस तरह कहने पर देवी अनसूया बड़े धर्म-संकट में आ गई और भगवान को अपने मन में स्मरण करते हुए बोली ”यदि मैंने अपने पती के समान किसी पुरुष को ना देखा हो, यदि मैंने धर्म, कर्म, वचन और सच्चे मन से अपने पती की सेवा करी हो तो मेरे इस सतीत्व के प्रभाव से ये तीनो महापुरुष नवजात शिशु में परिवर्तित हो जाये.”

देवी अनसूया  के ऐसा कहते ही त्रिदेव छः माह के नवजात शिशु बन गए. उन्हें देख देवी अनसूया के हृदय में मातृत्व का भाव उमडा तथा उन्होंने तीनो शिशुओ को अपना दूध पिला कर उन्हें अपनी गोद में झुलाने लगी. उधर स्वर्ग में त्रिदेवो के ना लौटने से तीनो देवियाँ चिंतित हो गई तब नारद जी ने उन्हें बताया की देवी अनसूया के सतीत्व के प्रभाव से वे तीनो बालक बन गए है. तीनो देवियाँ तुरंत पृथ्वीलोक अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंची तथा देवी अनसूया से माफ़ी मागने लगी. तीनो देवियो ने अनसूया से कहा की ईर्ष्यावश हम यह पाप कर बैठे, कृपया हमे क्षमा करे और हमारे पतियों को पुनः उनका वास्तविक रूप प्रदान करे.